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ghazal

 

मेरी उस्थिति

हिजरत के परिंदों को जब याद ए शजर आई।
एक हूक उठी दिल में और आँख भी भर आई।।

तय कर न सका राही, किस सम्त चले आखि़र।
भटकी हुई मंजि़ल से जब राहगुज़र आई।।

फू़लों की तरह मेरे अफ़कार महक उट्ठे।
खु़शबू मेरे माजी़ की जब जेह् न में दर आई।।

जब जश्न ए बहारा

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ग़ज़ल

ज़िन्दगी का न फैसला करते।
तो न जाने हम और क्या करते।
زندگی کا نہ فیصلہ کرتے
تو نہ جانے ہم اور کیا کرتے

उड़ने का हम जो हौसला करते।
आसमां को ज़मीन का करते।
ادنے کا ہم جو حوصلہ کرتے
آسماں کو زمین کا کرتے

इश्क में आप से वफ़ा करते।
हक मुहब्बत का यूँ अदा करते।
عشق میں

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हिन्दी रचना

मेरी उपस्थिति

एक हाहाकार सा है धरती और पाताल में।
फिर भी है आकाश हर पल मस्त अपने हाल में।।

होशियारी ये मछेरे की नही कीजे यकीं।
मछलियाँ तो  ख़ु़द भी फ़ंस जाती हैं अक्सर जाल  में।।

हम हैं वाबस्ता सदा से शायरी से इस लिये।
गीत लिक्खे और गाये हम ने सुर और ताल म

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ग़ज़ल

मेरी उपस्थिति

ये नया दौर है, सच के हैं सिकन्दर झूठे।
झूठ का राज है, राजा के हैं लश्कर झूठे।।

दो घडी़ के लिये आया है, तो मालूम हुआ।
हम ने जो सदियों में बनाये ,जो, वो सब घर झूठे।।

हम को बख़्शेगा मुहब्बत के हसीं ताज महल।
लनतरानी है तेरी, दावे सरासर झूठे।।

हम क

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या और बड़ी सी चादर दे
या क़द मेरा छोटा कर दे

मुझको दे सारा ज़हर मगर
सबको अमृत की गागर दे

मैं तो बदतर का आदी हूँ
औरों को जीवन बेहतर दे

ख़्वाहिश है छू लूँ आसमान
मुझको तू सुरख़ाबी पर दे

जिनके ज़हनों में मंज़िल है
उनको रस्ता दे, रहबर दे

ग़म से है जिनका आज भरा
उनका कल

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ग़ज़ल

 

पंख कतर कर जादूगर जब चिड़िया को तड़पाता है
सात समंदर पार का सपना , सपना ही रह जाता है

दुर्योधन हो या हो जयद्र्थ सबसे उसका नाता है
अब अपना गाँडीव उठाते ‘अर्जुन’ भी घबराता है

जब सन्नाटों का कोलाहल इक हद से बढ़ जाता है
तब कोई दीवाना शायर ग़ज़लें बुन कर

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ग़ज़ल

 

मैं लिखता नहीं हर्फ़-ए-सदाक़त के सिवा कुछ
सो मुझको मयस्सर नहीं वहशत के सिवा कुछ

जिसको  है  बदलते  हुए  हालात  का इलहाम
सूझेगा  भला  क्या  उसे दहशत के सिवा कुछ

हँसता   है    मेरी    दर्द - बयानी   पे   ज़माना
सो  पूछिए  मुझसे  मेरी  हालत  के सिवा कुछ

जो 

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न तो शोर है न ही ख़ामुशी, किसी गुंग की ये सदा है क्या
तू मेरे ख़ुदा मुझे ये बता, किसी और ढब की फ़ज़ा है क्या

कभी नागहां सरे राह भी मेरे रूबरू तू हुआ है क्या
तुझे फिर भी मान लूँ ज़िन्दगी, अब इसी में तेरी रज़ा है क्या

मैं ग़रीब हूँ तू अमीर है, मैं हूँ ग़मज़दा,

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ग़ज़ल

मेरी उपस्थिति ग़ज़ल

 

नींद का जि़म्मा नहीं आँखों के काशानों पर।
फ़र्ज़ बेदारी का लाजि़म है शबिस्तानो पर।।

 

अपने लोगों से ही जब खाये हैं धोके हम ने।
अब भला कैसे भरोसा करें बेगानों पर।।

 

दश्त-ओ-सहरा में बगूलों ने किया रक्स-ए-तरब।
टूट कर आई जवानी जो बयाबानों प

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ग़ज़ल

मेरी उपस्थिति

चटक गये सभी आईने एतबार के भी।
चला गया वो मेरी जि़न्दगी गुजा़र के भी।।

अना के खो़ल में लिपटे हुये मेरे दिल ने।
सुकून पाया उसे बे सदा पुकार के भी।।

न जाने कैसी अदावत थी तपते सूरज को।
कि फू़ल खिल नहीं पाया चमन सँवार के भी।।

बुलन्दियों से सफ़र करत

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हिन्दी रचना

मेरी उपस्थिति

नभ पे जिस क्षण आक्रोशित दामिनी हो जायेगी।
मेघ बरसेंगे गगन से जाह्नवी हो जायेगी।।

लेखनी से अवतरित होगी जो मन की भावना।
लिखते लिखते एक दिन कामायनी हो जायेगी।।

इतना कोलाहल है, इतनी चीत्कारेंं है कि बस।
भीड़ में अब आत्मा अन्तर्मुखी हो जायेगी।।

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ग़ज़ल

मेरी उपस्थिति
ग़ज़ल

कोई तो हो जो मिरी रूह में उतर जाये।
अन्धेरी रात के पैकर में नूर भर जाये।।

वो अपने साये में मुझ को छुपा के रख लेगा।
शजर से धूप की चादर ज़रा उतर जाये।।

मैं उसके क़ुर्ब की खु़शबू को भर लूँ दामन में।
गुज़रते वक़्त कह दो ज़रा ठहर जाये।।

इक आरज

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ग़ज़ल

मेरी उपस्थिति..ग़ज़ल

नमी ढूँढोगे सहरा में कहाँ तक।
नहीं मिलता समन्दर का निशाँ तक।।

अना ने ख़ुदकुशी कर ली है शायद।
गई है तिश्नगी आब-ए-रवाँ तक।।

यहाँ फ़ाकाकशी रायज है हर सू।
नहीं उठता मकानों से धुआँ तक।।

बहुत सन्नाटा था धड़कन में दिल की।
ख़मोशी आ गई है अब बयाँ

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ग़ज़ल

मेरी उपस्थिति..ग़ज़ल

हमने माना जि़न्दगी अच्छी नही
फि़र भी हरगिज़ खुदकुशी अच्छी नहीं।

ख़त्म कर दे आँख की बीनाई तक।
तेज़ इतनी रोशनी अच्छी नहीं।।

रख दो हर सू प्यार के रोशन चराग़।
जेह्न ओ दिल में तीरगी अच्छी नहीं।।

दिल में रख कर नफ़रतों के सिलसिले।
हम से यूँ वाब

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ग़ज़ल

मेरी उपस्थिति ग़ज़ल

उजाले जो इठला के गाने लगे।
अंधेरे भी घबरा के जाने लगे।।

जो नक़्श ए क़दम ढूँढते थे मेरा।
मुझे रास्ता वो दिखाने लगे।।

सितारों से करनी पडी़ दोस्ती।
मुझे रतजगे जब सताने लगे।।

अभी तो कोई बात हमने न की।
उठे आप, और उठ के जाने लगे।।

ज़रा उम्र की ध

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ग़ज़ल

मेरी उपस्थिति
ग़जल

जब घिरी कश्ती मेरी वक्त ए सफ़र तूफ़ान में।
दे गया दरिया भी कुछ गिरदाब मुझको दान में।।

यूँ किताब-ए-इश्क़ की तहरीर यकसर मिट गयी।
तोली जाती है वफ़ा अब झूठ के मीज़ान में।।

मरतकज़ किरदार पर रहती है दुनिया की नज़र।
एक लम्हा चाहिये रुस्वाई के ए

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बशर को ढाई आखर का अगर सद्ज्ञान हो जाए
वही गुरुग्रंथ गीता बाइबिल क़ुर्आन हो जाए

मजाज़ी औ हक़ीक़ी का अगर मीज़ान हो जाए
मेरा इज़हार यारों मीर का दीवान हो जाए

जला कर ख़ाक करना, कब्ल उसके ये दुआ देना
कि मेरा जिस्म सारा ख़ुद ब ख़ुद लोबान हो जाए

ख़ुदा को भूलने वाल

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नीमवा आँखें तुम्हारी कह रही हैं वो कहानी
दरमियानी दूरियाँ जब कम हुई थीं नागहानी

मुब्तिला थी लौ दिये की साज़िशों में साथ तेरे
जो हमारी धड़कनों की कर रही थी तर्जुमानी

तेरे दिल की आहटें मुझको सुनाई दे रही थीं
और भरती जा रा रही थीं मेरे दिल में बदगुमानी

मैं

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ग़ज़ल

आंखें न यूँ झुकाइये इस्मे शबाब की
हमको भी हैं उम्मीदें तुमसे जवाब की

दांतो में यूं दबाना होंटो के आपका
शर्मा गई है देखिये पखरी गुलाब की

पढ़ते रहें उम्र भर आंखो से आंख हम
ताआ़रीफ खूब कीजिये(हूं) इस निसाब की

हमने जो किया है हक़ जानकर किया
हसरत कभी न की है हमन

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परछाई के कद से

परछांई के क़द से अपने क़द का अंदाज़ा मतकर
सूरज डूब रहा हो तो उस ओर कभी देखा मतकर

मेरे क़द से मेरी चादर मेल नहीं खाती या रब
क़द ही थोड़ा और बढ़ा दे चादर को छोटा मतकर

तनहाई का दर्द कभी भी बाॅट नहीं लेगा कोई
कभीआइने के आगे जाकर ख़ुदको तनहा मतकर

ख़ुश है तो ख़ु

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