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गज़ल

All Posts (175)

परछाई के कद से

परछांई के क़द से अपने क़द का अंदाज़ा मतकर
सूरज डूब रहा हो तो उस ओर कभी देखा मतकर

मेरे क़द से मेरी चादर मेल नहीं खाती या रब
क़द ही थोड़ा और बढ़ा दे चादर को छोटा मतकर

तनहाई का दर्द कभी भी बाॅट नहीं लेगा कोई
कभीआइने के आगे…

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यूँ तो तमाम लोग हमारे रक़ीब हैं हम क्यों पता करें कि वो किसके क़रीब हैं। पाला नहीं है हमनें कोई भी मुग़ालता, अपने सिवाय और यहाँ अंदलीब हैं। माँगी नहीं है आपसे इमदाद कोई भी, इज़्ज़त से पेश आइये, माना ग़रीब हैं। ये क्या हुआ कि आज हुए हैं वो अश्कबार, कह…

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वो मुन्तज़र भी है आश्ना क्या
वही ख़यालों में बस गया क्या

यही सफ़र की है इन्तिहा क्या
नहीं है आगे का रास्ता क्या

तुम्हारे अहसान से दबगया क्या
किसी को वह बेजुबाॅ लगा क्या

न देखा जिसने यूॅ देखकर भी…

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ग़ज़ल



दामन वो मुझसे अपना छुड़ा कर चले गए
कस्रे हयात ही मेरा ढा कर चले गए
उनका हुनर न पूछिए पल भर को मेरे पास
आए वो मुझसे मुझको चुरा कर चले गए
पर्दे की लाज अपनी बचाने के वास्ते
कल शब वो मेरे ख़्वाब में आ कर चले गए…

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याद करते भी नहीं और न भुलाया जाए
रूठ जाएं तो उन्हें कैसे मनाया जाए

एक मुद्दत से निगाहों में बसी है सूरत
फिर कहाँ कोई नया ख्र्वाब बसाया जाए

आइना है कि तलब करता है पहली सूरत
वक़्त ठहरे तो वही अक्स दिखाया जाए

लाश…

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हिंदी गीतिका

क्यों अकारण ही करें पीड़ित हृदय को,
स्वयम ही स्वीकार लें बाधित समय को,

हर नदी की संधि है,सागर के तट पर,
ये हुआ, स्वीकारना निश्चित विलय को,

जब कभी सागर ने अपने बांध तोड़े,
कौन कर पाया है,मर्यादित प्रलय को ?

प्रेम की…

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हिंदी गीतिका

क्यों अकारण ही करें पीड़ित हृदय को,
स्वयम ही स्वीकार लें बाधित समय को,

हर नदी की संधि है,सागर के तट पर,
ये हुआ, स्वीकारना निश्चित विलय को,

जब कभी सागर ने अपने बांध तोड़े,
कौन कर पाया है,मर्यादित प्रलय को ?

प्रेम की…

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मशहूर क्या हुए कि वो मग़़रूर हो गये
अपनों से और ख़ुद सेबहुत दूर हो गये
 
जो ज़ख़्म दिये आपने रक्खे सम्हाल के 
गुज़रा जो वक़्त आख़िरश नासूर हो गये
 
कोशिश हजार की कि सम्हल जाए…
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भाई को भाइयों से लड़ाया न कीजिए
दीवार आँगनों में उठाया न कीजिए
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सम्मान जिस जगह न करे आपका कोई
ऐसी जगह तो भूल के जाया न कीजिए…

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शम्स था जोकि

शम्स था जोकि सरपर खड़ा होगया
मेरा साया कहीं गुमशुदा होगया

एक रिश्ता था वोभी फ़ना होगया
उसको कुर्सी मिलीतो ख़ुदा होगया

तीरगी का असर इन्तिहा होगया
मेरा साया भी मुझसे जुदा होगया

उसने मेरी हक़ीक़त जता दी मुझे
यूँ…

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जब अंधेरे को

जब अँधेरे को बेहद गुमाँ होगया
एक जुगुनू से आलम रवाँ होगया

लौट आये वहीं, थे जहाँ से चले
उम्र-भर का सफर रायगाँ होगया

हम चले,तुम चले,ये चले,वो चले
एक मंज़िल थी सो कारवाँ होगया

दबगया,बोझ इतना था अहसान का
एक दिन…

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ग़ज़ल -कुबूल है

1212 1212 1212 1212

शराब जब छलक पड़ी तो मयकशी कुबूल है ।
ऐ रिन्द मैकदे को तेरी तिश्नगी कुबूल है ।

नजर झुकी झुकी सी है हया की है ये इंतिहा ।
लबों पे जुम्बिशें लिए ये बेख़ुदी कुबूल है ।।

गुनाह आंख कर न दे हटा न इस तरह…

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ग़ज़ल इस्लाह के लिए

  1. ग़ज़ल
 
फूले-फलेंगे ज़ख्म सितमगर के आसपास
घर सोचकर लिया है तेरे घर के आसपास
 
जब काम  लीजिए तो' ज़रा एहतियात से
पैनी है' ये जुबान भी' खंजर…
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बेबसी


तोड़ देती है सभी को कैसे हाए बेबसी
अश्क़ सब के ये बहाए दिल जलाए बेबसी

सरहदों पर लड़ रहे हैं जो वतन के वास्ते
फ़िक्र बनकर उनकी माँओं को जगाए बेबसी

यार जब से छोड़ कर तन्हा गया मुझको यहाँ
हिज्र के गुल बाग में हर दिन…

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हिन्दी रचना

मेरी उपस्थिति

गीतिका

जब बसंती रंग ले कर धरती से अम्बर मिला।
अपने प्राणों के लिये चिन्तित बहुत पतझर मिला।।

लेखनी के सूखे अधरों को भिगोयें किस तरह।
शब्द की संयोजनाओं से विमुख अक्षर मिला।।

उषा की रक्तिम छटा से ये…

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मेरे जैसा एक मैं हूं दूसरा कोई नहीं
सब हक़ीक़त जानते हैं मानता कोई नहीं

एक मुद्दत बाद देखा आइना तो यूँ लगा
ग़ालिबन ये शख़्स मैं हूँ दूसरा कोई नहीं

ज़िन्दगी ने गुल खिलाए और बूढ़ा करदिया
सब नज़र के सामने है देखता कोई…

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