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गज़ल

All Posts (93)

एक और ताज़ा ग़ज़ल

ग़ज़ल

कहाँ हैं संग फ़लक पर उछालने वाले ।
समुन्दरों से वो रस्ता निकालने वाले ।

यही है फ़िक्र कि ख़ुद ही बिखर न जाएँ कहीं ,
हरेक हाल में सब को संभालने वाले ।

बहुत दिनों से अकेला उदास बैठा हूँ ,
कहाँ गए मुझे मुश्किल…

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ग़ज़ल

कई दिन से......वो मेरी सिम्त भी आया नहीं है
उसे मालूम है........अब मुझपे सरमाया नहीं है

शकर जिससे मैं लूं जिसको कटोरी भर कढ़ी दूं
यहां फ्लैटों में.........ऐसा कोई हमसाया नहीं है

हमेशा झूठ के संग रह........हुआ है ये भी झूठा…

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मुहब्बत

पहली मुहब्बत तो बस पहली मुहब्बत होती है।।
उसके बाद में इश्क़ महज़ इक फितरत होती है।।

दरिया और लहरों का रिश्ता चलता रहता है,
पर मैं उसको प्यार करूँ तो दिक्कत होती है।।

तुम उसके ख्वाबों में हो और वो और किसी के,
ऐसी इश्क़गिरी…

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मुहब्बत

पहली मुहब्बत तो बस पहली मुहब्बत होती है।।
उसके बाद में इश्क़ महज़ इक फितरत होती है।।

दरिया और लहरों का रिश्ता चलता रहता है,
पर मैं उसको प्यार करूँ तो दिक्कत होती है।।

तुम उसके ख्वाबों में हो और वो और किसी के,
ऐसी इश्क़गिरी…

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जमाने भर के रंजो गम से मैं आबाद रहता हुँ
मैं खुशियों की कतारों में भी सबके बाद रहता हूं

मुझे ये गम नहीं है के गमों से राब्ता क्यूँ है
ग़मो में भी मगर हर वक़्त मैं आबाद रहता हुँ।

हवाओँ से मुझे बस आज ये एक बात करनी है
बहारो…

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कभी ऐसा भी हो के तुम मेरे ख्वाबों में आ जाओ
रख दो हाथ सीने पे मेरे दिल मे समा जाओ।

ये तन्हाई का आलम रात भर मुझपे गुजरता है
सजाओ सेज फूलो की मेरी बांहों में आ जाओ।

अधूरा आसमाँ रोता है मिलने को चाँन्दनी से
बनके महताब पूनम…

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लाख बैठें वो कहीं छुपकर गुलाबों में
ढूँढ ही लेंगे उन्हें हम कल बहारों में
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चोट मजनूँ को लगे हो दर्द लैला को
अब कहाँ वो प्यार के किस्से किताबों में…

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अच्छा सा कोई शे'र सुनाओगे आज क्या
दीवाना मुझको फिर से बनाओगे आज क्या
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निकले हो देखने कि टपकता है कैसे घर
मेरे ग़रीबखाने पे आओगे आज क्या…

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एक शिकवा है ज़िन्दगी से मुझे
छीन ले जाएगी मुझी से मुझे

बेख़याली का इक ख़्याल हूं मैं
कौन अपनाएगा ख़ुशी से मुझे

मुझको ख़ुद्दार कर गयी यारो
प्यार है तब से मुफलिसी से मुझे

इस बुढ़ापे में इन्तहा डर है
मेरे अपनों…

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ग़ज़ल

बड़ी बेखबर हूँ, हक़ीक़त बता दूं,
तुझे ज़िन्दगी अब कहाँ से सदा दूँ,

चमकती है बिजली सी ख़ामोशियों में,
अभी मैं भला कैसे घर को सजा दूँ

बहुत उम्र गुज़री अजब तीरगी में,
ये जी चाहता है कि दामन जला दूँ,

यहां मेरा अंदाज़ सब से…

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मुसीबत आपने भी मोल ली क्या
किसी  नादान से  की दोस्ती क्या
 
न जाने क्यों कोई सहमत नहीं है
बहुत मुश्किल हुई है रहबरी क्या
 
चलो  इक  प्यार का  मक़्तब बनाएं
मुहब्बत की नहीं…
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चन्द घड़ियां बवाल करती हैं
और सदियां मलाल करती हैं

फ़क़्र है हमको इस बुढ़ापे में
बेटियां देखभाल करती हैं

शक्ल पर वक़्त की लकीरें भी
आइने से सवाल करती हैं

बिन कहे भी हमारी ख़्वाहिश का
सिर्फ़ मांएं ख़याल करती…

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थकन के बाद भी चलते रहो इसरार करती हैं
मुझे बैसाखियां मेरी बहुत लाचार करती हैं

कभी हालात लमहे में बदलते हैं ज़माने के
कभी सदियां किसी अंजाम से इन्कार करती हैं

कभी कुछ सूरतें पत्थर बनी सी देखते रहिए
कभी कुछ पत्थरों में…

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دکھ dukh

मैं सुनाऊं किसे हयात का दुख
मेरे अंदर है कायनात का दुख

میں سناؤں کسے حیات کا دکھ
میرے اندر ہے کاینات کا دکھ
वस्ल में दिन गुजारने वाले
हिज्र में मुझसे पूछ रात का दुख

وصل میں دن گزارنے والے
ہجر میں مجھ سے…

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221 2121 1221 212
मुद्दत के बाद आई है ख़ुश्बू सबा के साथ ।
बेशक़ बहार होगी मेरे हमनवा के साथ ।।

शायद मेरे सनम का वो इज़हारे इश्क था…

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