का़फि़ये पर ग़ज़ल

मेरी उपस्थिति

जब सदफ़ से किसी मोती को निकाला गया है।
डूब कर पहले समन्दर को खंगाला गया है।।

हमने तकरार का मौका़ कभी आने न दिया।
उम्र भर खु़द को तेरे साँचे में ढाला गया है।।

हसरतों को भी सजा कर रखा दिल में हमने।
आरजू़ को भी बहुत नाजो़ं से पाला गया है।।

अपने ही जिस्म में ज़म हो गया छाँव का वजूद।
सायबानों को मगर धूप में डाला गया है।।

नूर से भर गयीं एहसास की सब तीरा शबी।
जेह् न में जिसके मुहब्बत का उजाला गया है।।

सर चढा़ सिक्का भी लौट आया ज़मी की जानिब।
जब कभी सूये फ़लक उस को उछाला गया है।।

क्या बतायें उसे किस तरह से गुज़री 'मीना'।
वक़्त तन्हाई का खा़मोशी से टाला गया है,।।
मीना नक़वी

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Comments

  • बहुत ही ख़ूब
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