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गज़ल

ग़ज़ल

गज़ल

चराग़ ए दिल बुझा के वक़्फ़ ए ताक़ कर दिया गया।
हमारी साँस साँस को मजा़क़ कर दिया गया।।

खु़शी के साज़गार लम्हे उस को नागवार थे।
मुहब्बतों में पैदा यूँ निफा़क़ कर दिया गया।।

ये दिल की धड़कनों में कैसी आ गयी है तमकनत।
जो जि़न्दगी का सिलसिला सियाक़ कर दिया गया।।

अब आदमी भी कितना तन्हा हो गया है बज़्म में।
सदा ए खामुशी को तमतराक़ कर दिया गया।।

हुआ है येभी सानेहा मुहब्बतों कि राह में।
मिलन की साअतों  को जब फि़राक़ कर दिया गया।।

हजा़र ग़म थे दिल में और अश्क अश्क आँख थी।
खु़शी के लम्हों को कुछ ऐसे आक़ कर दिया गया।।

ये रस्म आजकल हुयी है 'मीना' आम हर तरफ़।
कि दिल से चाहतों को भी तलाक़ कर दिया गया।।


मीना नक़वी

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