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गज़ल

ग़ज़ल

आदमी ने शौक़ में यूँ ही लुटाई ज़िन्दगी,

थी सिरहाने पे कज़ा तो याद आई ज़िन्दगी,

 

शख़्स इक वो जानता है ज़िन्दगी के मायने,

मौत से लड़ लड़ के है जिसने बचाई ज़िन्दगी,

 

मैं पुजारी मानता था ज़िन्दगानी को मगर,

काटती है ख़ुद जो है ऐसी कसाई ज़िन्दगी,

 

ज़िन्दगी के शोरगुल से हो गया था तंग वो,

करके उसने ख़ुदखुशी साइड हटाई ज़िन्दगी,

 

साथ तेरे ज़िन्दगी है जब तलक है घर में तू,

नौकरी करने लगा तो है पराई ज़िन्दगी,

 

ज़िन्दगी ने जंग का ऐलान अपनों से किया,

लग रहा है आज फिर से पी के आई ज़िन्दगी,

 

वक्त ठहरा इक शिकारी ज़िन्दगी है इक शिकार,

वक्त के आगे खड़ी देती दुहाई ज़िन्दगी!!

 

संघर्ष

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Comments

  • Bhaiya sapace de kar post karen .. padhne mein aasaani hogi
    • Done
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