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गज़ल

ग़ज़ल

ज़िन्दगी   की  राह   यह  मुश्किल बड़ी है,
हर क़दम पर इक न इक उलझन खड़ी है।

बारहा   छू   कर   गुज़रती   है   क़ज़ा  यूँ,
ज़िन्दगी   भी   और   जीने   पर  अड़ी है।

हो   गयी   है   इंतिहा   शायद   ग़मों   की,
यूँ   नहीं  आँखों  में  अश्कों  की  लड़ी है।

खेल।  है   ये  आतिशो - बारूद  का   ही,
हाथ   में   अत्फाल  के  जो  फुलझड़ी है।

बाँध   रक्खा  है   हमें   जिसकी  वफ़ा ने,
वो   कलाई   नर्म   है , पर   हथकड़ी   है।

ज़हन   में    सबके    भरी   हैं   वासनाएँ,
हर   नज़र  उरियाँ  बदन  पर  ही गड़ी है।

जा   रहा  है  वक़्त   हाथों  से  फिसलता,
हाँ,   नज़र   के  सामने   यूँ  तो  घड़ी  है।

रंग    लायेगीं     हमारी     कोशिशें     ही,
सिर्फ़   धोखा   है,  कि  जादू की छड़ी है।

हम   सुख़नवर    हैं, हमें अहसास सबका,
आपको   तो   सिर्फ़  अपनी  ही  पड़ी है।

( आनन्द )

 

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