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गज़ल

आसमां को चीर कर देखूँ न क्यों उस पार मैं
ख़्वाब को कैसे हक़ीक़त कह दूँ आख़िरकार मैं

ज़िन्दगी बाक़ी है, अपने अज़्म पर है ऐतबार
जीत की उम्मीद है तो मान लूँ क्यों हार मैं

बाप हूँ तो बेटियों की प्यास क्यों समझूँ नहीं
माँगकर गंगा को शिव से क्यों न दूँ उपहार मैं

अब्र के टुकड़े से भी घटता है जब सूरज का ताप
ग़म के बादल हैं घिरे तो क्यों रहूँ बेजार मैं

मौत की चादर में लिपटी ज़िन्दगी की लाश को
देखकर ग़मगीं हुआ, रोया भी बारम्बार मैं

बन के घर बीमारियों का हो गया हूँ चारागर
जानता हूँ अब हर इक दुख दर्द का उपचार मैं

हर ख़बर हो ख़त्म जिसपर हो के उसपर ही शुरुअ
उसके हर इक हाल को क्यूँ कर करूँ अख़बार मैं

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