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गज़ल

रात सोना माना है मुझे
ख़्वाब भी देखना है मुझे

ज़िन्दगानी तेरी धूप की
छाँव में भीगना है मुझे

आप ख़ुश हों तो मैं भी हँसूँ
ये अभी सीखना है मुझे

आदमी में ही इंसान है
बस उसे ढूँढना है मुझे

ज़िन्दगी इक पहेली है तो
अब इसे बूझना है मुझे

राबिते जोड़ने के लिए
उम्र भर टूटना है मुझे

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Comments

  • वाह वाह लाजवाब ग़ज़ल।
    • Shukriya Meena ji
  • वाह क्या बात है
    • धन्यवाद प्रिया जी
  • बेहतरीन अशआर,,,,वाहहह
    • शुक्रिया संदीप भाई
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