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गज़ल

ग़ज़ल

कई दिन से......वो मेरी सिम्त भी आया नहीं है
उसे मालूम है........अब मुझपे सरमाया नहीं है

शकर जिससे मैं लूं जिसको कटोरी भर कढ़ी दूं
यहां फ्लैटों में.........ऐसा कोई हमसाया नहीं है

हमेशा झूठ के संग रह........हुआ है ये भी झूठा
कि हमने सच को सच की सफ में बैठाया नहीं है

यकीं उसको परों पर.........आंधियों से है जियादा
परिंदा पेड़ के हिलने से.............घबराया नहीं है

अभी से तुमने जाने की......भला क्यों रट लगा ली
दरीचों पर अभी तो............चाँद भी आया नहीं है

रहे हैं साठ सालों से.........मुसलसल साथ लेकिन
अभी तक ज़िन्दगी ने मुझको......अपनाया नहीं है

ये खुद से बोलना हंसना....बिगड़ना चीख पड़ना
मियां ये इश्क़ है.............आसेब का साया नहीं है

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Comments

  • वाह ।
  • बढ़िया है भाई जी
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