एक और ताज़ा ग़ज़ल

ग़ज़ल

कहाँ हैं संग फ़लक पर उछालने वाले ।
समुन्दरों से वो रस्ता निकालने वाले ।

यही है फ़िक्र कि ख़ुद ही बिखर न जाएँ कहीं ,
हरेक हाल में सब को सँभालने वाले ।

बहुत दिनों से अकेला उदास बैठा हूँ ,
कहाँ गए मुझे मुश्किल में डालने वाले ।

बदलते वक़्त के साँचे में ढल गए ख़ुद ही ,
हरेक दौर को साँचे में ढालने वाले ।

मुझे तलाशे-गुहर है कहाँ तलाश करूँ ,
कहाँ गए वो समुंदर खँगालने वाले ।

सुना है ज़ह्रे-सियासत से मर गए वो भी ,
थे आस्तीं में जो साँपों को पालने वाले ।

किया है वक़्त ने 'नादान' तुमको भी ठण्डा ,
थे ख़ूब तुम भी लहू को उबालने वाले ।

राकेश 'नादान'

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Comments

  • लाजवाब।
    • बहुत-बहुत शुक्रिया जनाब कुमार ठाकुर साहब ....बेहद नवाज़िश
  • बहुत-बहुत शुक्रिया जनाब शेषधर तिवारी साहब....बेहद नवाज़िश
  • लाजवाब ग़ज़ल हुई राकेश भाई।
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