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फ़िलबदीह ग़ज़ल का मिसरा

शराफ़त आपने भी छोड़ दी क्या

1222 1222 122

क़ाफ़िया - ई की मात्रा वाले

रदीफ़ - क्या

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All Discussions (56)

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हासिले फ़िल

अव्वलन तुझको  यूँ  बेदार नहीं होना था
और गर था भी तो इज़हार नहीं होना था

वो गई बात है चल ख़ाक उड़ा दे उस पर
मसअला  ये मगर इस बार नहीं होना था

इश्क़ है  इश्क़ में झगड़े भी हुआ करते हैं
तुझको इस  बात पे बीमार नहीं होना…

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4 Replies · Reply by Babu Gautam on Tuesday

फि़लबदीह ग़ज़ल

ग़जल

गुरेजाँ है अना से तिश्नगी क्या।
समन्दर तक गयी है खुद नदी क्या।।

चुरा कर ले गयीं तपती हवायें।
गुलों के सुर्ख़ होटों की नमी क्या।।

ज़रा देखो मेरी बातों से आई।
किसी के ग़मज़दा रुख पर हँसी क्या।।

फ़क़त…

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5 Replies · Reply by Akhilesh Krishnwanshi on Sunday

फिलबदिह के तहत

लहर फिर से कोई दिल में उठी क्या।
ज़रा देखो कोई खिड़की खुली क्या।।

हज़ारों रंग बिखरे हैं फ़िज़ां में।
तेरी यादों की तितली उड़ गई क्या।।

वहीं तकिये पे रक्खी छोड़ दी थी।
मुक्कमल इक ग़ज़ल थी वो, मिली…

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ग़ज़ल

ग़ज़ल

किसी से जब से उल्फ़त हो गयी है।
बडी़ रंगी तबीअत हो गयी है।।

 

हमारी दोस्ती को क्या वो समझे।
जिसे खु़द से अदावत हो गयी है।।

 

सिवा तेरे नहीं कुछ याद मुझ को।
तेरी चाहत मुसीबत हो गयी…

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4 Replies · Reply by Dr.meena naqvi Aug 11

फ़िलबदीह ग़ज़ल

पसंदीदा वो सूरत हो गई है।
उसे पाने की चाहत हो गई है।

हुए जब से वो शामिल ज़िंदगी में,
रक़ीबों से अदावत हो गई है।

ये हसरत है कि अब एलान कर दूं,
मुझे उनसे मुहब्बत हो गई है।…

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ग़ज़ल

ग़ज़ल

जब खुद नज़र से अपनी उतर जायें हम तो क्या।
जि़न्दा रहें कि जाँ से गुज़र जायें हम तो क्या।।

जब आ गये हैं सहरा नवरदी को रास हम।
थक कर मसाफ़तों से जो घर जायें हम तो क्या।।

दहलीज़ पर अना की यूँ रक्खा नहीं चराग़।…

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8 Replies · Reply by Dr.meena naqvi Aug 10

फिलबदीह ग़ज़ल

मेरी कोशिश....
 
मुझे जब से मुहब्बत हो गयी है
ग़ज़ल भी ख़ूबसूरत हो गयी है
 
इसी को क्या कहा जाता है चाहत ?
मुझे  अब उसकी आदत हो गई है
 
वह क्यों हटता नहीं आंखों से…

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1 Reply · Reply by Ritu kaushik Aug 10

ग़ज़ल

एक ख़्वाहिश यही कुंवारी है
मेरे सीने में जांं तुम्हारी है

रंग और रूप है सलोना सा
बेक़रारी शब कहां गुज़ारी है

सिलवटों में उदासी पैहम है
अश़क़ और आह में रंगदारी है

नुक़्ता नुक़्ता ग़मों से बोझिल है
लफ़्ज़ दर…

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5 Replies · Reply by shahab uddin shah Aug 4

saturday

ग़ज़ल

इश्क कुछ ऐसा इज़्तेरारी है।
बाजी़ जीती हुई भी हारी है।।

मुझसे आती है खुशबुए-मिट्टी।
अब के लगता है मेरी बारी है।।

हम ज़मीं पर पडे़ वो ज़र्रे हैं।
चाँद-तारों से जिसकी यारी है।।

धूप ढलते ही ज़र्द मौसम…

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6 Replies · Reply by Ritu kaushik Aug 4

प्रयागराज - लखनऊ - कानपुर - नोएडा - नई दिल्ली - चंदौसी - मेरठ - साँईखेड़ा - इंदौर - भोपाल - जयपुर - आगरा