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फ़िलबदीह ग़ज़ल का मिसरा

एकतरफ़ है उसका घर तो सारी दुनिया एकतरफ़

22 22 22 22 22 22 22 2

क़ाफ़िया - आ की मात्रा वाले

रदीफ़ - एक तरफ़

मिसरे पर गिरह न लगाएँ

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कुछ फिल्बदीह अशआर

चाँद सितारे सूरज वूरज .. सब फीके उसके आगे 
सारे पत्ते एकतरफ़ हैं .. तुरुप का इक्का एक तरफ़
 
इक दूजे को फ़ोन मिला कर घन्टो हम चुप रहते हैं 
प्यार मुहब्बत एक तरफ है ,  पर अनबोला…

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2 Replies · Reply by Vineet Aashna Oct 6

ग़ज़ल

मेरी उपस्थिति

रूठने और मनाने वाला कल का शिकवा एक तरफ़।
हम तुम दोनों मिल बैठें तो सारा झगडा़ एक तरफ़।।

 

लाख छिपायें दिल में अपने, आँख झुका कर बात करें।
इश्क़ का उनके बस्ती बस्ती लेकिन चर्चा एक तरफ़।।

 

माना…

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6 Replies · Reply by Dr.meena naqvi Oct 6

फिल्बदीह ग़ज़ल

अपनी मंजिल ख़ुद ढूँढें हम रख कर झगड़ा एक तरफ़
तेरा रस्ता एक तरफ़ अब मेरा रस्ता एक तरफ़

दो पाटों में जीवन अपना गेहूँ जैसे पिसता है़
मँहगाई है़ एक तरफ़ मौसम का गुस्सा एक तरफ़

दोनों जानिब आफात ख़ड़ी
जीये अब कैसे मछली…

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4 Replies · Reply by Mrs. RAJESH KUMARI Oct 6

फि़लबदीह ग़ज़ल

मेरी उपस्थिति

शब है ख़्वाबों के सिलसिले के लिये।
मेरी आँखें हैं रतजगे के लिये।।

फि़क्र करनी बहुत ज़रूरी है।
ज़िन्दगानी के फ़लसफे के लिये।।

देखें मरने के बाद क्या होगा।
जान दी हम ने…

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6 Replies · Reply by Dr.meena naqvi Sep 29

ग़ज़ल

शुक्रिया लब को खोलने के लिए
प्यार के बोल बोलने के लिए

ये लरज़ते हैं होंट क्यों आख़िर
जब भी खुलते हैं बोलने के लिए

ये निगाहें झुकी सी उठती हैं
मेरे अल्फ़ाज़ तौलने के लिए

लब पे मुस्कान यूं बिखरती है
दम ब दम…

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2 Replies · Reply by shahab uddin shah Sep 29

फिल्बदीह ग़ज़ल

रात बाकी गुजारने के लिए
आओ यारो मुशायरे के लिए

सर्द है़ रात तीरगी भी है़
चाय कॉफी हो काफ़िले के लिए

चल पड़ा सिलसिला सुख़न का अगर
आएगी धूप रोकने के लिए

हमने खुशियों की फ़स्ल बोई थी
ग़म चले आये काटने के…

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फ़िलबदीह ग़ज़ल

फ़िलबदीह ग़ज़ल

ये ज़रूरी है रास्ते के लिए ।
साथ कोई हो हौसले के लिए ।

जल्दबाज़ी में लुट गए हम भी ,
काश रुक जाते काफ़िले के लिए ।

उड़ गए तोड़कर क़फ़स पंछी ,
वक़्त ही कब था सोचने के लिए ।

तर्क करना है तअल्लुक…

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2 Replies · Reply by Rakesh Tyagi Sep 28

हासिले फ़िल

अव्वलन तुझको  यूँ  बेदार नहीं होना था
और गर था भी तो इज़हार नहीं होना था

वो गई बात है चल ख़ाक उड़ा दे उस पर
मसअला  ये मगर इस बार नहीं होना था

इश्क़ है  इश्क़ में झगड़े भी हुआ करते हैं
तुझको इस  बात पे बीमार नहीं होना…

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4 Replies · Reply by Babu Gautam Aug 20

फि़लबदीह ग़ज़ल

ग़जल

गुरेजाँ है अना से तिश्नगी क्या।
समन्दर तक गयी है खुद नदी क्या।।

चुरा कर ले गयीं तपती हवायें।
गुलों के सुर्ख़ होटों की नमी क्या।।

ज़रा देखो मेरी बातों से आई।
किसी के ग़मज़दा रुख पर हँसी क्या।।

फ़क़त…

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5 Replies · Reply by Akhilesh Krishnwanshi Aug 18

फिलबदिह के तहत

लहर फिर से कोई दिल में उठी क्या।
ज़रा देखो कोई खिड़की खुली क्या।।

हज़ारों रंग बिखरे हैं फ़िज़ां में।
तेरी यादों की तितली उड़ गई क्या।।

वहीं तकिये पे रक्खी छोड़ दी थी।
मुक्कमल इक ग़ज़ल थी वो, मिली…

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