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All Discussions (61)

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ghazal

ghazal

बेडी़ है हर इक पाँव में, हर नेजे़ पे सर है।
लगता है कि ये जु़ल्म- ओ-तशद्दुद का नगर है।।

साँसों में तेरी खु़शबू के गुल खिलते हैं हर दम।
यूँ तेरी मुहब्बत का मेरे दिल पे असर है।।

क्या जाने मसाफ़त को कहाँ खे़मा…

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9 Replies · Reply by Dr.meena naqvi Aug 13

ग़ज़ल

ग़ज़ल

बेज़बां  की ज़बान  है  पैसा 

आदमी  का  गुमान है पैसा 

 

फ़स्ल झगड़े की जो उगाता है 

एक  ऐसा  किसान है पैसा 

 

लोग  झूठे  गवाह  बनते हैं 

आज  गीता  क़ुरान है पैसा 

 

दूर  अपने  हुए…

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6 Replies · Reply by अमित 'अहद' Aug 11

Ek Khwab Si Ladki

मिटा दो नाम पानी का लगा कर आग पानी में

फ़क़त सहरा बचे अर्ज़-ओ-समा की इस कहानी में

 

उफ़क़ पर डूबते सूरज की देखो तुम कलाकारी

शफ़क़ बंधेज रच डाला चुनर उस आसमानी में

 

समंदर ज़िंदगी का पार करने हम चले…

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2 Replies · Reply by SD TIWARI Aug 11

ग़ज़ल

ग़ज़ल

एक दूजे को फ़क़त आएँगे वीराने नज़र
क्या मिलेगा आइने को आइने में झाँक कर

जाते जाते ले गया वो दो मसाइल साथ मे
इक उसे पाने की हसरत दूसरा खोने का डर

काटना है जान-लेवा हर किसी के वास्ते
वस्ल की रंगीनियों के बाद का…

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1 Reply · Reply by SD TIWARI Aug 11

ग़ज़ल

ग़ज़ल

अब शिकारे पर अमन सरगोशियाँ करने लगे हैं
झील की खामोशियों में गुदगुदी भरने लगे हैं ।

जब महकने को कहा माली ने केसर क्यारियों को
फूल को पत्ते सभी आगोश में भरने लगे हैं ।

जल गये कंदील कश्ती में,सितारे हैं ज़मी पर…

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ग़ज़ल

ग़ज़ल

हालात के दरियाओं में ख़तरे के निशाँ तक।
चल पायेंगें क्या आप मिरे साथ वहाँ तक?।।

हम गर्द हैं रह पायें फिज़ाओं में कहाँ तक।
हो जाता है तहलील हवाओं में धुआँ तक।।

मैं मुल्क बदर सब्र को कर…

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4 Replies · Reply by Dr.meena naqvi Aug 5

ग़ज़ल

ग़ज़ल 

संदीप श्रीवास्तव 'दीप'

8787265620

 

तुमने अब तक हिज़्र का ताब नहीं देखा 

या'नी अश्कों का सैलाब नहीं देखा 

 

बस तुमको देखा था हमने, उसके बाद

फिर कोई लम्हा नायाब नहीं देखा 

 

तेरी…

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2 Replies · Reply by SD TIWARI Aug 4

आज की लिखी सरल सी ग़ज़ल

ग़ज़ल...

इक नदी है एक छोटा सा है घर
राम सीता और लक्ष्मण का है दर।

झूमते वन प्रांत वनवासी मगन
राजकुँवरों सँग वधू को देखकर ।

साधु संतों का तपोवन है सुखी
साथ प्रभु के वह विचरते हो निडर ।

प्यार पशुओं पक्षियों को…

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ग़ज़ल

अश्क बन बन के छलकती रही मिट्टी मेरी
शोले कुछ यूँ भी उगलती रही मिट्टी मेरी

मेरे होने का सबब मुझको बताकर यारो
मेरे सीने में धड़कती रही मिट्टी मेरी

लोकनृत्यों के कई ताल सुहाने बनकर
मेरे पैरों में थिरकती रही…

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10 Replies · Reply by Dwijendra Dwij Aug 4

ग़ज़ल

 

कहाँ पहुँचे सुहाने मंज़रों तक
वो जिनका ध्यान था टूटे परों तक 

जिन्हें हर हाल में सच बोलना था
पहुँचना था उन्हीं को कटघरों तक 

लकीरों को बताकर साँप अकसर
धकेला उसने हमको अजगरों तक …

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8 Replies · Reply by Dwijendra Dwij Aug 4

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