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All Discussions (67)

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ग़ज़ल

फ़ैलुन*4
22 22 22 22

तू  जो   मेरे  साथ  नहीं  है
बेहतर  कोई  बात  नहीं  है

सूख चुकी हैं बोझिल आँखें
अब  इनमें  बरसात नहीं है

जिस्म  तेरा  है  संगेमरमर
गर्मी  है  जज़्बात  नहीं  है

मुझ को अपने जैसा कर…

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1 Reply · Reply by SD TIWARI yesterday

ग़ज़ल

जिस किसी दिल में मुहब्बत का शजर लगता है
रुख प, गुफ्तार प लहजे पे असर लगता है

चारागर कहते हैं दिल मेरा धड़कता कम है
तेरे दिल छोड़ के जाने का ज़रर लगता है

कूज़ागर वक़्त बहुत गूंध चुका ख़ाक मेरी
अब न तुझसे न तेरे चाक से डर लगता…

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1 Reply · Reply by SD TIWARI yesterday

ग़ज़ल

ग़ज़ल

बहर-- फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़ेलुन

तेरी तारीफ़ में नग़्मात कहाँ से लाऊँ.
बात जो तुझमें है वो बात कहाँ से लाऊँ..

सींच दे दिल की जो धरती को मुहब्बत बन कर.
अपनी ग़ज़लों में वो बरसात कहाँ से लाऊँ.

मैं…

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याद करते भी नहीं और

याद करते भी नहीं और न भुलाया जाए
रूठ जाएं तो उन्हें कैसे मनाया जाए

एक मुद्दत से निगाहों में बसी है सूरत
फिर कहाँ कोई नया ख्र्वाब बसाया जाए

आइना है कि तलब करता है पहली सूरत
वक़्त ठहरे तो वही अक्स दिखाया जाए

लाश…

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ग़ज़ल

ग़ज़ल

हालात के दरियाओं में ख़तरे के निशाँ तक।
चल पायेंगें क्या आप मिरे साथ वहाँ तक?।।

हम गर्द हैं रह पायें फिज़ाओं में कहाँ तक।
हो जाता है तहलील हवाओं में धुआँ तक।।

मैं मुल्क बदर सब्र को कर…

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6 Replies · Reply by Dr.meena naqvi Sep 30

आज की लिखी सरल सी ग़ज़ल

ग़ज़ल...

इक नदी है एक छोटा सा है घर
राम सीता और लक्ष्मण का है दर।

झूमते वन प्रांत वनवासी मगन
राजकुँवरों सँग वधू को देखकर ।

साधु संतों का तपोवन है सुखी
साथ प्रभु के वह विचरते हो निडर ।

प्यार पशुओं पक्षियों को…

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1 Reply · Reply by Rakesh Tyagi Sep 30

एक और ताज़ा ग़ज़ल

ग़ज़ल

जिसकी फ़ितरत में हँसना-हँसाना रहा ।
उसकी मुट्ठी में सारा ज़माना रहा ।

जिससे मिलने को दिल ये दिवाना रहा ।
उसके होठों पे हरदम बहाना रहा ।

इक मुलाक़ात उनसे न मुमक़िन हुई ,
ख़्वाब में तो बहुत आना-जाना रहा…

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2 Replies · Reply by Rakesh Tyagi Sep 30

ghazal

ghazal

बेडी़ है हर इक पाँव में, हर नेजे़ पे सर है।
लगता है कि ये जु़ल्म- ओ-तशद्दुद का नगर है।।

साँसों में तेरी खु़शबू के गुल खिलते हैं हर दम।
यूँ तेरी मुहब्बत का मेरे दिल पे असर है।।

क्या जाने मसाफ़त को कहाँ खे़मा…

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9 Replies · Reply by Dr.meena naqvi Aug 13

ग़ज़ल

ग़ज़ल

बेज़बां  की ज़बान  है  पैसा 

आदमी  का  गुमान है पैसा 

 

फ़स्ल झगड़े की जो उगाता है 

एक  ऐसा  किसान है पैसा 

 

लोग  झूठे  गवाह  बनते हैं 

आज  गीता  क़ुरान है पैसा 

 

दूर  अपने  हुए…

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6 Replies · Reply by अमित 'अहद' Aug 11

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