------ चौपाल ------


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चौपाल

All Discussions (81)

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मुसीबत आपने भी मोल ली क्या

मुसीबत आपने भी मोल ली क्या
किसी  नादान से  की दोस्ती क्या
 
न जाने क्यों कोई सहमत नहीं है
बहुत मुश्किल हुई है रहबरी क्या
 
चलो  इक  प्यार का  मक़्तब बनाएं
मुहब्बत की नहीं…

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कुछ सवाल

1. इज़ाफ़त का प्रयोग दो भाषा के शब्द (जैसे अरबी के साथ फ़ारसी शब्द "शौक़-ए-ज़िंदगी" ) को मिलाकर किया जा सकता है क्या ?

2. बे ईमानी  को  2122 लिया जा सकता है क्या ?

3.  नज़र-ए-शौक़  का मात्रा भार क्या होगा ?

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2 Replies · Reply by Dinesh Kumar Drouna Aug 13

मुहब्बत का सिला देना

मुहब्बत का सिला देना
बिना  माँगे  दुआ  देना
 
ग़मों की भीड़ कितनी हो
ख़ुशी   को   रास्ता  देना
 
बड़ी  नेकी  सदाक़त है
किसी को आसरा देना
 
ख़ुदा मिल जाय…

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गज़ल

 

मतला

*बिछड़ करके तुमसे किधर जाउंगी मैं
इधर आके अब ना , उधर जाउंगी मैं..
Or
*कफ़स तोड़कर के किधर जाउंगी मै मिली गर रिहाई तो मर जाऊंगी मैं

*गुरुरे मुहब्बत , डराता है मुझको
है अदना मेरा कद ,सिहर जाऊंगी…

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3 Replies · Reply by SD TIWARI Aug 10

इस्लाह के लिए

ग़ज़ल

221   2122   221   2122

चैन-ओ-सुकूँ गँवा दे दौलत न ऐसी देना

माँगूँ भी मैं ख़ुदा तो नेमत न ऐसी देना

 

दिल मेरा नासमझ है, कुछ ख़्वाहिशें करेगा

रह जाए जो अधूरी चाहत न ऐसी देना

 

उल्फ़त में सर…

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गंगा-जमुनी ग़ज़ल

गंगा-जमुनी ग़जल

एक उस के सिवा नाम मुझे याद नहीं है।
कब सुब्ह है, कब शाम मुझे याद नहीं है।।

 

नारी का तो बनबास अज़ल से है मुक़द्दर।
सीता हूँ मैं और राम मुझे याद नही है।।

 

ये याद है कि सब्ज़ परी होती थी…

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2 Replies · Reply by Dr.meena naqvi Jul 26

ग़ज़ल

ग़ज़ल 

बोला नहीं वो कुछ भी मगर देखता रहा 

चुपचाप ख़ुद को कटता शजर देखता रहा 

 

ताउम्र देख पाया नहीं ख़ुद की खामियां 

बस ऐब दूसरों के बशर देखता रहा

 

बख़्शा था जो मुझे किसी अपने अज़ीज़ ने 

मैं उम्रभर वो…

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3 Replies · Reply by Amod shrivastava Jul 26

नहीं था मुंतजिर वह

नहीं था मुंतजिर वह इस घड़ी का
जिसे चस्का लगा था रहबरी का

मुहब्बत एक जज़्बा है नदी का
मगर अंजाम भी है ख़ुदकुशी का

बज़िद बच्चे कभी होते नहीं है
उन्हें अहसास है क्या मुफलिसी का

हमारे साथ कब तक है सफर में
भरोसा…

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4 Replies · Reply by Dr.meena naqvi Jul 26

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