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चौपाल / चुनिंदा अशआर

सिवाए  राख़  के  छोड़े  जो  आग कुछ भी नहीं
शिकम की आग के आगे वो आग कुछ भी नहीं

 

ख़त्म होती है मौत पर जा कर
ज़ीस्त  की  हद  यही मुक़र्रर है

 

वो  मुश्कबू  सा  मेरे  आस-पास  रहता  था
मैं जिसकी चाह में हर पल उदास रहता था

 

खाद-पानी अगर नहीं होता
कोई पौधा शजर नहीं होता

 

उन्हें फ़िक्र है राज़ मुबहम रहे
हमें  लुत्फ़  पर्दा  उठाने  में है

 

  1. भरत दीप 

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Replies

  • Waaahh....
    • बहुत शुक्रिया आपका भाई
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