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चुनिंदा अशआर


बग़ैर दीद के तेरी ख़ुदा करार नहीं
तेरे सिवा तो किसी पर भी ऐतबार नहीं

हमें उसूल पे चलना सिखा दिया तूने
सफ़ेद सच है, कोई झूठा इश्तिहार नहीं

बिखर न जाये मेरे वक़्त की ये रेत कहीं
रखा है कस के इसे, है ये बेशुमार नहीं

लहू रगों में रवां है तो उसकी मर्ज़ी से
हमारे दिल पे हमारा ही अख़्तियार नहीं

अभी पिया ही नहीं जाम आख़िरी मैंने
सुरूर मय का है तारी अभी, ख़ुमार नहीं

अगर लहू है रगों में तो ज़ोर मारेगा
ख़मोश रह के सहे सब वो ताबदार नहीं

शरीफ़ शख़्स को कमज़ोर मान मत लेना
ख़ुलूस सब से निभाये वो ख़ाकसार नहीं

 शेषधर तिवारी

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Replies

  • वाह्ह्ह सर उम्दा ग़ज़ल ! 

    • शुक्रिया अमित जी

  • बहुत उम्दा।

    • शुक्रिया मीना जी

  • Bahut hi umdah ghazal.

    ret ke liye pighal na jae ke bajae agar bikhar na jae kahen to shayed behtar bhi ho aur beshumar ke sath theek rahe.

    Admin nahin, yahan to apka nam aana chahiye.

    • शुक्रिया सर जी। ठीक कर दिया।

      नाम भी लिख दिया।

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