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वृहस्पतिवार - दी गई बह्र पर ग़ज़ल

छोड़ ही देता हूँ अब मैं मुस्कराना
शर्त है बस सामने मेरे न आना

साफ़ है नीयत तुम्हारी जानता हूँ
पर न जाने क्यों बनाते हो बहाना

एक टक देखूँगा मैं कुछ देर उनको
आँसुओं तुम बीच मे बिल्कुल न आना

खो गयी इक दिन जो शादी की अँगूठी
हाथ पूरे दिन पड़ा मुझको छुपाना

ख़ैरियत पूछी हमारी दुश्मनों से
इसको भी तो कहते है रिश्ता निभाना

टूट जाएगा हिसारे सब्र जिस दिन
अश्क मेरे साथ फिर तुम भी बहाना

बैठने दूँगा नही यूँ होंठ सी कर
है हमें मालूम कैसे है हँसाना

धूप की पैरों को आदत पड़ चुकी है
छाँव में छालों के दिल को क्यों दुखाना

तुम मेरे नज़दीक आकर क्या करोगे
जब तुम्हें आता है बस नज़रें झुकाना

 

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Replies

  • Waah waah

    • शुक्रिया हिना जी।

  • waaahh सर

    बहुत प्यारी ग़ज़ल

    • Thanks rohit

  • बहुत ही उम्दा ग़ज़ल है सर

    • शुक्रिया भाई

  • WaaaaaaAh 

    bahut khoob sir 

    • धन्यवाद विनीत भाई

  • वाह वाह वाह

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