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एक ग़ज़ल

All Discussions (106)

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हम इश्क़ का अभी तो हवन सीख रहे हैं

 
 
धोका फ़रेब दोगलापन सीख रहे हैं 
हम  शहरियत के चाल चलन सीख रहे हैं 
 
ग़ज़लों का हम जो यार ये फ़न सीख रहे हैं 
सीने की कैसे कम हो घुटन सीख रहे…

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2 Replies · Reply by Vineet Aashna 5 hours ago

सोमवार की ग़ज़ल

पारा पारा उम्र भर आधा इधर आधा उधर
ज़िंदगी का ये सफ़र आधा इधर आधा उधर

आ गई जो बीच में दीवार इसके देखिए
बंट गया हिस्सों में घर आधा इधर आधा उधर

भा गया बच्चों को जबसे दूसरा देखो वतन
रह गया दिल और जिगर आधा इधर आधा…

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5 Replies · Reply by Mrs. RAJESH KUMARI yesterday

ग़ज़ल

नहीं  कटता  हमारा  चैन  से  इक  पल  तुम्हारे बिन
हर एक लम्हा हुआ जाता है दिल बेकल तुम्हारे बिन

 

यक़ीनन  ये  हमारे   दिल  का  पिंजरा  तोड़  डालेंगे
कई   यादों  के  पंछी   हो  गए  पागल  तुम्हारे  बिन

 

बढ़ी …

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2 Replies · Reply by SD TIWARI yesterday

शजर ख़ुद शामियाना चाहता है

 

कहाँ कोई पुराना चाहता है
नया हरदम ज़माना चाहता है

हवस तो रूह को तेरी है जानाँ
बदन खाना कमाना चाहता है

शिकारी हो गया बेज़ार शायद 
निशाना चूक जाना चाहता है

हवा है मुफ़्त में बदनाम .. सूरज
चरागों को…

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17 Replies · Reply by Vineet Aashna Oct 9

ग़ज़ल :

ग़ज़ल :

हर काम टालते रहे , कल पे विचारते रहे
आया नहीं कभी भी कल बस दिन गुज़ारते रहे

ہر کام ٹالتے رہے کل پے وچارتے رہے
آیا نہیں کبھی بھی کل بس دن گزارتے رہے

अपनी शबे-विसाल पर हमको यकीं हुआ नहीं
हम तो तमाम रात बस उनको…

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2 Replies · Reply by Shubham Sufiyana Oct 9

ग़ज़ल

ग़ज़ल


ये क्या कम है मुहब्बत उसने यूँ इनआम कर दी।
कि सब तल्खी़ समन्दर ने नदी के नाम कर दी।।


मुहब्बत के गुलों से महके महके थे जो जज़्बे।
जहाँ ने उनकी भी पाकीज़गी दुशनाम कर…

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16 Replies · Reply by Dr.meena naqvi Oct 8

ग़ज़ल

ग़ज़ल

मत  कर हैरानी 

ये दुनिया फानी 

 

बोल रहा ये दिल 

संतों  की  बानी 

 

छायी है जग में 

हर  सू  वीरानी 

 

इस मुश्किल युग में 

ढूँढ़ न आसानी 

 

क्यों अब सूख गया…

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4 Replies · Reply by अमित 'अहद' Oct 7

भाई को भाइयों से लड़ाया न कीजिए

भाई को भाइयों से लड़ाया न कीजिए
दीवार आँगनों में उठाया न कीजिए
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सम्मान जिस जगह न करे आपका कोई
ऐसी जगह तो भूल के जाया न कीजिए…

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सोमवार की ग़ज़ल

ग़ज़ल

कट रही थी ज़िन्दगी ये शान से ईमान से ।
वो गए तो हो गए वीरान से ईमान से ।

चन्द अधूरी नज़्म और थीं कुछ अधूरी ग़ज़लियात ,
कुछ न हासिल हो सका सामान से ईमान से ।

तंग आए रोज़ के झगड़ों से हम भी क्या करें ,
अब हमें…

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8 Replies · Reply by Rakesh Tyagi Oct 7

ग़ज़ल

हथियार तेरे किस को डराने के लिये हैं
हम तो तेरा हर वार बचाने के लिये हैं

हर फूल की क़िस्मत में शिवाला नहीं होता
कुछ फूल जनाज़े प चढ़ाने के लिये हैं

आँसू को सदा ग़म से ही जोड़ा नहीं करते
ख़ुशियों में भी कुछ अश्क बहाने के लिये…

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5 Replies · Reply by BHARAT DEEP Oct 7

शम्स था जोकि

शम्स था जोकि सरपर खड़ा होगया
मेरा साया कहीं गुमशुदा होगया

एक रिश्ता था वोभी फ़ना होगया
उसको कुर्सी मिलीतो ख़ुदा होगया

तीरगी का असर इन्तिहा होगया
मेरा साया भी मुझसे जुदा होगया

उसने मेरी हक़ीक़त जता दी मुझे
यूँ…

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3 Replies · Reply by BHARAT DEEP Oct 7

सोमवार के लिए ग़ज़ल

ग़ज़ल 

कहें क्या आदमी ने कैसे-कैसे दिल दुखाया है,
शजर को काट डाला फिर परिन्दों को उड़ाया है,

 

मिलेगा आजकल इक दूसरा चहरा सभी के पास,
सभी ने झूठ का पर्दा जो चहरे से लगाया है,

 

किया मत कर भरोसा जल्दबाज़ी…

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5 Replies · Reply by BHARAT DEEP Oct 7

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