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एक ग़ज़ल


आपके कुरेदने से ये हरा हुआ नहीं
ज़ख्म ज़िद पे आ गया है इसलिये भरा नहीं

अज़्म जिन मुसाफ़िरों में है डटे हैं राह पर
क्या हुआ जो मंज़िलों का कुछ अता पता नहीं

कुछ नहीं मिला नदी में पत्थरों को फेंक कर
अक्स जो भी दिख रहा था वो भी अब रहा नहीं

मैं तुम्हारी ख़ोज में ये आसमान चीर दूँ
लेकिन उसके बाद क्या, जो तू वहाँ मिला नहीं

दौर है नया तो चाहिए नया ही तौर भी
रह गए लकीर के फ़कीर तो रवा नहीं

आज अगर नहीं तो बोलना पड़ेगा कल तुम्हें
ख़ामुशी से आज तक किसी को हक़ मिला नहीं

तू मुझे भला कहे, बुरा कहे कि और कुछ
पर मेरी नज़र में तेरे जैसा दूसरा नहीं

आजमाइशों में मुब्तिला रहें यूँ बेसबब
ऐसा तो हमारे बीच कोई मुद्दआ नहीं

212 1212 1212 1212

 

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