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हुस्न अगर मग़रूर नहीं है
तो दिल्ली भी दूर नहीं है

मेरे दिल मे सीधे आओ
दस्तक का दस्तूर नहीं है

तुम बस छू दो भर जाएगा
ज़ख़्म है ये नासूर नहीं है

मुझमे ताकत है चलने की
वो भी थक कर चूर नहीं है

वो मायूस हुआ है फिर भी
ग़मगीं है रंजूर नहीं है

तेरी ख़ातिर क्यों मर जाऊँ
लड़की है तू हूर नहीं है

तू काबिज़ हो मेरे दिल पर
ये मुझको मंज़ूर नहीं है

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Replies

  • बहुत खूब ग़ज़ल तिवारी सर
    • शुक्रिया हिना जी
  • बहुत ख़ूब क्या कहने हैं जनाब
    • शुक्रिया राकेश जी
  • वाह
    • शुक्रिया अनीश भाई
  • Bahut khoobsurat gazal..
    • शुक्रिया निशा जी
  • क्या कहने
    • धन्यवाद उर्मिला जी
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