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बुधवार-हिंदी रचना

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Replies

  • तम अधिक गहरा है माना
    किन्तु तुम मत डगमगाना
    अपनी लाचारी को अपनी
    जीत का परचम बनाना

    खोल दें जब गाँठ मन की
    फिर कहाँ सामर्थ्य तन की
    व्योम की ऊँचाइयों को
    नापने से रोक पाना
    तम अधिक गहरा .........
    किन्तु तुम मत .........

    क्या हुआ जो,कुछ कमी है
    पूर्ण कोई भी नहीं है
    क्यों भला फिर हीनता का
    व्यर्थ में बोझा उठाना
    तम अधिक गहरा ..........
    किन्तु तुम मत ..........

    पर उमंगों के पकड़ लो
    स्वप्न बाहों में जकड़ लो
    चीर कर कष्टों का सीना
    सीख लो डर को डराना
    तम अधिक गहरा ..........
    किन्तु तुम मत ..........

    दर्द के मरुथल भी होंगे
    सोच पर बादल भी होंगे
    तोड़ झंझावत तुमको
    सूर्य सम है जगमगाना
    तम अधिक गहरा .........
    किन्तु तुम मत .........

    भरत दीप

    •  अत्यंत सुँदर ,आशावादी और  साहस का संचार  करती हुई रचना  ।

  • एक प्रयास

    पीर, दुख, अवसाद से बाधित न हो
    देश भ्रष्टाचार से शापित न हो

    मत करो विश्वास इक अंजान पर
    जिस के तुम व्यवहार से परिचित न हो

    प्रार्थना है उस विधाता से यही
    मेरे शब्दों से कोई पीड़ित न हो

    तू ने जो सपना संजोया प्रीत का
    मूँद ले पलकें कि वो खण्डित न हो

    भावना है मन की देहरी पर खड़ी
    शब्द के आघात से शोणित न हो

    है खुला नभ छू ले तू ऊँचाइयाँ
    तू क्षितिज के पार जा , वंचित न हो

    अपनी इच्छाओं को वश में रख सदा
    ऐसा क्या जीवन जो मर्यादित न हो
    _____________________________

    ’शिफ़ा’ कजगाँवी

    • अतीव सुन्दर सृजन है 

    • बहुत सुन्दर

    • वाह वाह

  • नवगीत 

    मन के भीतर एक जुलाहा
    उजली चादर बुनता है़

    लोभ मोह की गांठें कितनी
    पर निन्दा के ढेले थे
    अवगुण की ख़ाने ही खानें
    अपराधों के मेले थे
    अन्जाने में इस रूअड़ ने
    दंश पाप के झेले थे
    सच्ची निष्ठा की पाटी से मैला रूअड़ धुनता है़
    मन के भीतर एक जुलाहा
    उजली चादर बुनता है़

    नफ़रत की गांठें
    सिलवट ये
    ज़ल्दी ज़ल्दी खोल रहा
    सच्चाई से दूर किया है़
    जो भी झूठा झोल रहा
    त्याग तपस्या का हर इक पल
    धागों में अनमोल रहा
    अरमानों की छितरी कलियाँ
    प्यार वफ़ा से चुनता है़
    मन के भीतर एक जुलाहा
    उजली चादर बुनता है़

    रंग हरा धरती से माँगा
    अंबर से माँगा नीला
    लाल गुलाबी तितली से और
    फूलों से माँगा पीला
    लिया पवन से पंख
    सुखाया
    जो भी था बूटा गीला
    पहले दिल की सुनता था वो
    दिल अब उसकी सुनता है़

    मन के भीतर एक जुलाहा
    उजली चादर बुनता है़
    राजेश कुमारी राज

    • बहुत सुन्दर रचना है। साधुवाद!

    • बहुत सुन्दर

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