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Replies

  • गीत

    ढूँढ रहा हूँ कब से उसको,
    एक मिलन की आस लिये।..

    सोच-सोच कर बीती बातें,
    बढ़ जाती है और उदासी।
    मेरे जीवन में न आई,
    हाय कभी भी पूर्णमासी।
    कितने शूल बिखेर दिये हैं,
    जीवन के इस दुर्गम पथ में।
    कैसे अड़ियल अन्धे घोड़े ,
    बाँध दिये हैं मेरे रथ में।

    रुक- रुक आगे बढ़ता जाऊँ,
    मन में इक विश्वास लिये।
    ढूँढ रहा हूँ कब से उसको,
    एक मिलन की आस लिये।

    भटक रहा हूँ कब से प्यासा,
    कभी यहाँ तो कभी वहाँ पर।
    मृगतृष्णा के बहकावे में,
    पहुँच गया हूँ अरे कहाँ पर।
    पता नहीं मुझको मंज़िल का,
    दिशाहीन सा चल देता हूँ।
    अपनी बेचैनी अकुलाहट,
    मन ही मन में सह लेता हूँ।

    घूम रहा हूँ नदी किनारे ,
    जन्म-जन्म की प्यास लिये।
    ढूँढ रहा हूँ कब से उसको ,
    एक मिलन की आस लिये।

    कभी-कभी बस मैं भी कैसे ,
    क्यों सोचों में खो जाता हूँ।
    किसी सबल निश्चय की कोई,
    बाती नहीं जला पाता हूँ।
    उड़ जाती है रंग बिरंगी,
    चिढ़िया निस दिन दाने खाकर।
    संकेतों में कह जाता कुछ,
    बीत रहा हर लम्हा आकर।

    बीत रहा है जीवन पल-पल,
    श्वासों का इतिहास लिये।
    ढूँढ रहा हूँ कब से उसको,
    एक मिलन की आस लिये।..

    केवल कृष्ण पाठक "केवल"
    बिलासपुर छत्तीसगढ़

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