कृपया स्माइली का प्रयोग न करें

दैनिक आयोजनों की पोस्ट के लिए आपको 7 दिन मिलते हैं यानी जब तक उस दिन के लिए अगला प्रोग्राम न दे दिया तब तक। इस तरह आप प्रतिदिन हर प्रोग्राम की रचना पोस्ट कर सकते हैं



बुधवार-हिंदी रचना

हिंदी काव्य की किसी भी विधा की रचनाएँ पोस्ट करें। 

हिंदी में कही गयी ग़ज़लें भी पोस्ट की जा सकती है।

You need to be a member of Sukhanvar International to add comments!

Join Sukhanvar International

Email me when people reply –

Replies

  • क्यों अकारण ही करें पीड़ित हृदय को,
    स्वयम ही स्वीकार लें बाधित समय को,

    हर नदी की संधि है,सागर के तट पर,
    ये हुआ, स्वीकारना निश्चित विलय को,

    जब कभी सागर ने अपने बांध तोड़े,
    कौन कर पाया है,मर्यादित प्रलय को ?

    प्रेम की अभिव्यक्ति हो निर्मल हृदय से,
    तब कहाँ सीमाएं,अनुमोदित प्रणय को ?

    हम स्वयम प्रहरी हैं अपनी भावना के,
    और नहीं तोड़ेंगे, अनुबंधित वलय को,
    उर्मिला माधव,

    • वाह वाह वाह वाह 

    • क्या  बात है,  वाह 

    • Wajah wajah bahut sunder

    • बहुत सुन्दर।

    • बहुत सुन्दर

  • समय की आवाज़

     

    मौन हूँ मैं , बस दर्शक जैसा ,
    युग युग से यूँ खड़ा हुआ।
    परिवर्तन का साक्षी हूँ मैं,
    समय के पग पर पड़ा हुआ ।।

     

    ब्रह्माण्ड के शून्य रूप को ,
    इक बिन्दु ने आकृति दी।
    फिर असीमित सार ने इसको ,
    चह्ँ दिशा में स्वीकृति दी।।

     

    शून्य का विभेदन कर के
    समुद्र , पर्वत, संसार बनाया,
    निरन्तर परिवर्तन ने बढ़ कर ,
    पृथ्वी का आकार बनाया।।

     

    तरूवर, पौधे ,कली, फूल को,
    धरती का श्रंगार बनाया।
    नदिया, पोखर, झरने, झील को,
    जीवन का आधार बनाया।।

     

    प्राणवायु से ओतप्रोत हो,
    हरियाली हर ओर बिछाई।
    चाँद- सितारों और सूरज से,
    घरती माँ की माँग सजाई।।

     

    सर्दी-गर्मी और वर्षा से,
    ऋतुओं का आभास कराया।
    चहूँ ओर जीवन के हेतु ,
    वायु का संजाल बिछाया।।

     

    प्रकृति का राज प्रबन्धन,
    प्रशंसित था व्यवस्थित था।।
    परन्तु मानव का अवतारण ,
    इस धरती पर ही निॆश्चित था।।

     

    मानव ने धरती पर आकर,
    प्रंपच का अपने जाल बिछाया।
    प्रकृति की स्वायत्ता मे ,
    अपना मन मस्तिष्क घुसाया।।

     

    काट दिये जंगल के जंगल ,
    निगल गया हरियाली सारी।
    पर्वत सब समतल कर डाले,
    नदियों में प्रदूषण भारी।।

     

    सुखा दिये सब झील और पोखर,
    कंकरीट के जंगल बोये।
    स्वार्थ की भेंट चढ़े तरूवर भी,
    घोसलों को सब पक्षी रोये।।

     

    कुपित हुयी सृष्टि की दृष्टि,
    प्रकृति ने बदले तेवर ।
    उलट पलट सब जग कर डाला,
    त्राहि त्राहि चीखा घर नर।।

     

    विभीषिका जब बाढ़ की आई,
    बह गये सब घर बार चौबारे।
    अकाल पड़ा तो दूर दूर तक,
    भूख ने नर, नारी ,पशु मारे।।

     

    समुद्र ने भीआँख तरेरी,
    सूनामी सुनसान कर गयी।
    भूकंम्पन के कहर की आहट ,
    नगर नगर शमशान कर गयी।।

     

    अतिवृष्टि ने कहीं कहीं पर,
    कठिन किया मानव का जीना।
    बिजली के गिरने से अक्सर ,
    विष का घूँट पड़ा है पीना।।

     

    प्रकृति का कोप किसी दिन ,
    मानव , तुमको खा जायेगा।
    अन्धकार का काला बादल ,
    विश्व में इक दिन छा जायेगा।।

     

    मैं समय हूँ ,समझाता हूँ ,
    अपने ढंग को बदलो मानव ।
    वरना तय है ,डस जायेगा
    बर्बादी का विषधर दानव।।

    प्रकृति के भेद को समझो,
    हरियाली धरती पर बो दो ।
    धरा खनन पर अंकुश रखो,
    भावना जल दोहन की खो दो।।

     

    हरी भरी यह धरती जग को,
    हर दुख से आज़ाद करेगी।
    आने वाली पीढ़ी तुमको
    शुभ वचनों से याद करेगी।।


    मीना नक़वी

    • ज़बरदस्त, वाह  ।

    • Uttam srijan

    • उत्कृष्ट सृजन के लिये बहुत बहुत बधाई

This reply was deleted.

प्रयागराज - लखनऊ - कानपुर - नोएडा - नई दिल्ली - चंदौसी - मेरठ - साँईखेड़ा - इंदौर - भोपाल - जयपुर - आगरा