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बुधवार-हिंदी रचना

हरिगीतिका छंद

हरिगीतिका छंद

सामर्थ्य हो जैसी बनायें, आशियाना या किला।
हिस्से हमारे जो पड़ा है, वह नसीबों में मिला।
लेकिन गरीबों को टपकता - झोंपडा लगता किला।
संतोष का सुख तो हमेशा, झोंपड़ों को ही मिला।१।

जो आप आगे बढ़ रहे हैं, आप खुश हो लीजिए।
अपने सगे सम्बन्धियों पर, ध्यान थोड़ा दीजिए।।
ये खुश रहें तो खूब बढ़ कर, बस प्रशंसा ही करें।
वरना जलन में तो सगे भी, व्यर्थ ही आहें भरें।।

सब कुछ गँवाकर जो बनाता, आफिसर संतान को।
फिर क्यूँ वही बेटा कुचलता, बाप के अरमान को।। 
बेटा भुलाता बाप माँ को, और अपनी पीढियाँ।
क्यूँ भूल जाता है उन्हें जिन ने दिखाई सीढियाँ।३।

बेटी अगर खुद सास को भी, माँ कहे ससुराल में।
फिर सास भी उस को तनूजा*, मानती हर हाल में।। 
ससुराल में बेटी रहेगी, यदि स्वयं बन कर बहू।
तो द्वन्द तो होगा बहेगा, भावनाओं का लहू।४। 

[तनूजा - बेटी] 

दामाद आये रोज घर यदि, तो बहुत अच्छा लगे।
ससुराल यदि बेटा महीने, में गया ओछा लगे।। 
बेटी हमारी है दुलारी, हर दुआ उसके लिए।
तो क्यूँ नही घर में हमारे, हर बहू  सुख से जिए।५।

अब दान और दहेज को तो, भूल जाना चाहिए।
हमको हमारे पाक रिश्ते, को निभाना चाहिए।। 
हम एक दूजे को अगर दिल - से लगा स्वीकार लें।
जीवन सफल होगा हमारा, प्यार देकर प्यार लें।६।

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Replies

  • बहुत उम्दा सर

  • साज़िश, धोखा, मित्रता राजनीति के अंग,
    ग़रज़ पड़े तो नेवलों के घर रहें भुजंग।

    मर्यादा भी त्याग दी, भूली शिष्टाचार,
    राजनीति करने लगी, गाली में गुफ़्तार।

    सोच-समझ निर्णय करें, या भुगतें परिणाम,
    विकृतियों का दूसरा, राजनीति है नाम।

    राजनीति के हैं पता, हमको सारे कृत्य,
    वो उतना आगे बढ़ा, जितना कहे असत्य।

    धर्म, सियासत आजकल, सर्वोत्तम ब्यवसाय,
    अहंकार , पाखण्ड के, हैं दोनों पर्याय।

    मुखमण्डल पर सौम्यता, दिल में रख कर खोट,
    दर - दर नेता घूम कर, आज माँगते वोट।

    जन मानस समझे नहीं, राजनीति के खेल,
    बस बाहर टकराव है, भीतर सबसे मेल।

    • बहुत ख़ूब सर जी

    • उत्तम विप्रवर

      लेकिन मेरी पोस्ट की कमेंट में पोस्ट हो गयी

  • वाह। वाह। 

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