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दिए गए क़ाफ़िये पर ग़ज़ल या अशआर पोस्ट करें

All Discussions (68)

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क़ाफ़िया 15 अक्टूबर से 21 अक्टूबर तक के लिए

 

  • दिए गए काफ़िये पर अशआर या पूरी ग़ज़ल नीचे रिप्लाई बॉक्स में पोस्ट करें।
  • गुणवत्ता पर विशेष ध्यान दें।…

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8 Replies · Reply by Dr.meena naqvi 6 hours ago

ग़ज़ल

अजब कैफ़ियत दिल पे तारी हुई है
बिना   बात   के   सोगवारी  हुई  है

 

कफ़स  में  परिंदा  तड़पता हो जैसे
कुछ  ऐसी  मुई   बेक़रारी   हुई   है

 

बदलने  लगी  हैं  ज़माने  की  नज़रें
ज़रा  जो   तरक्क़ी   हमारी …

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2 Replies · Reply by Sangharssh Oct 8

का़फि़ये पर

 ग़ज़ल

दिल में ख्वाहिश है कि धरती पे नवाज़िश(कृपा) हो जाये।
काश , आ जाये घटा, झूम के बारिश हो जाये।।

धूप के साथ तपिश ले के चला आया है।
आज सूरज की न पूरी कहीं साज़िश हो जाये।।

नाव काग़ज़ की हो , बरसात के पानी मे…

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4 Replies · Reply by Dr.meena naqvi Oct 1

ग़ज़ल

ग़ज़ल

छोड़िये बातें हठीली बात हो बस प्यार की
कोई ज़िद अच्छी नहीं है प्यार में बेकार की

इक तलातुम सर उठा कर आ रहा है सामने
देखना ढीली न करना मुठ्ठियाँ पतवार की

कट रही है ज़िन्दगी यूँ शोरिशों के जाल में
लग रहा है चल…

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2 Replies · Reply by SD TIWARI Oct 1

ग़ज़ल

और ले जाएगी कहां मुझको ये ताबिश तेरी
हम को सहरा में ले आई है ख़्वाहिश तेरी

ज़िन्दगी रेत के मानिन्द बही जाती है
रोक सकती नहीं मुट्ठी की भी काविश तेरी

तीरगी ज़ख़्म जुनूं सोज़ अता हैं तेरी
ग़म भी कुछ और हैं मुझ पर ये…

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1 Reply · Reply by Kewal Krishan Pathak Oct 1

ग़ज़ल

तू मुहब्बत में कभी रोया नहीं,
तूने शायद आईना देखा नहीं,

वक़्त के चेहरे की देखीं झुर्रियां,
क्या दरूँ था ये कभी सोचा नहीं,

उम्र भर तड़पे ये तनहा ज़िन्दगी,
तूने शायद ऐसा कुछ खोया नहीं....

दास्तां कहता है आधी रात की,…

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4 Replies · Reply by Urmila Madhav Sep 23

दिये गये काफि़ये पर ग़ज़ल

ग़ज़ल

वफा़ओं का मेरी पलको पे रतजगा होगा।
ख़बर न थी, यूँ मुहब्बत का सिलसिला
होगा।।


चले थे इसलिये हम अज़्म की पनाहों में।
पता था हम को कि पथरीला रास्ता होगा।।


नदी चटानों से टकरा के हँसती रहती है।…

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10 Replies · Reply by Dr.meena naqvi Aug 14

ग़ज़ल 2122 2122 2122 212

धूप में जैसे कुहासा इक तसव्वुर आपका
है हसीं झोंका हवा का इक तसव्वुर आपका

ज़ेहन में आ कर कहीं से गुदगुदाने लग गया
देख कर मुझको रुआँसा इक तसव्वुर आपका

सीढ़ियाँ कितनी भी चढ़ लूँ भूल जाने की भले
साँप है…

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2 Replies · Reply by Dinesh Kumar Drouna Aug 14

दिए गए क़ाफिये पर ग़ज़ल

ग़ज़ल

मेरी वफ़ा का मुझको ही मिलता सिला नहीं ।
मेरा वुजूद क्या है ये मुझको पता नहीं ।

क्यूँ उसकी फ़ितरतों में ज़रा भी वफ़ा नहीं ।
क्या उसके इस गुनाह की कोई सज़ा नहीं ।

करते है सब ही इश्क़ मगर सबको है पता ,
ये वो…

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2 Replies · Reply by Rakesh Tyagi Aug 13

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