दिए गए काफ़िये पर अशआर या पूरी ग़ज़ल कहें।

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आज के लिए क़ाफ़िया अलिफ़ "आ" की क़ैद वाले।

अगर हे के क़वाफ़ी लें तो मतले में उसका प्राविधान कर लें।

बह्र और रदीफ़ आप ख़ुद चुनें।

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तू मुहब्बत में कभी रोया नहीं,
तूने शायद आईना देखा नहीं,

वक़्त के चेहरे की देखीं झुर्रियां,
क्या दरूँ था ये कभी सोचा नहीं,

उम्र भर तड़पे ये तनहा ज़िन्दगी,
तूने शायद ऐसा कुछ खोया नहीं....

दास्तां कहता है आधी रात की, ?
पूछ उससे जो कभी सोया नहीं,

आँख से टपका लहू,चस्पां रहा,
दाग़ फिर दिल का कभी धोया नहीं..
उर्मिला माधव...

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Replies

  • दास्तां कहता है आधी रात की, ?
    पूछ उससे जो कभी सोया नहीं,

    आँख से टपका लहू,चस्पां रहा,
    दाग़ फिर दिल का कभी धोया नहीं..

    उम्दा ग़ज़ल
  • वाह-वाह बहुत ख़ूब क्या कहने हैं
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