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ग़ज़ल

मेरी वफ़ा का मुझको ही मिलता सिला नहीं ।
मेरा वुजूद क्या है ये मुझको पता नहीं ।

क्यूँ उसकी फ़ितरतों में ज़रा भी वफ़ा नहीं ।
क्या उसके इस गुनाह की कोई सज़ा नहीं ।

करते है सब ही इश्क़ मगर सबको है पता ,
ये वो मरज़ है जिसकी कहीं कुछ दवा नहीं ।

अब और क्या भला मैं मुहब्बत का दूँ सुबूत  ,
मैंने वो सुन लिया है जो तुमने कहा नहीं ।

सब हाल नामाबर के ही चेह्रे पे दर्ज है ,
यूँ उसने अपने ख़त में तो कुछ भी लिखा नहीं ।

कितनी ही कर ले कोशिशें इंसान उम्र भर ,
आता पकड़ में ज़ीस्त का लेकिन सिरा नहीं ।

है बात तो ये ठीक मगर देखो सोच कर ,
'नादान' है बुरा मगर इतना बुरा नहीं ।

राकेश 'नादान'

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Replies

  • अब और क्या भला मैं मुहब्बत का दूँ सुबूत।
    दर्ज (typo)
    बेहतरीन ग़ज़ल, हार्दिक बधाई।
    • बहुत-बहुत शुक्रिया जनाब नाज़ प्रतापगढ़ी साहब ....बेहद नवाज़िश ...आपके द्वारा बताया गया मिसरा दुरुस्त कर दिया है
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