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ग़ज़ल

212   212   212   212

दौर-ए-मसरूफ़ियत में ये क्या हो गया

आदमी आदमी से जुदा हो गया

 

सर सभी का जो पत्थर के आगे झुका

देखते देखते वह ख़ुदा हो गया

 

ख़ुद निभाया नहीं फिर है क्यूँ कर गिला

नाम टूटे अहद का वफ़ा हो गया

 

तैरना उसको आता नहीं था मगर

डूबी कश्ती तो वो नाख़ुदा हो गया

 

ज़िन्दगी से नहीं है शिक़ायत मुझे

बस मुक़द्दर से थोड़ा गिला हो गया

 

अब तो पाबंदियाँ हद से बढ़ने लगीं

रू-ब-रू सबके रोना मना हो गया

 

दर्द की दास्ताँ भी बहुत है अजीब

जब बढ़ा हद से ज़्यादा दवा हो गया

 

©पल्लवी मिश्रा, दिल्ली।

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