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मुसीबत आपने भी मोल ली क्या

मुसीबत आपने भी मोल ली क्या किसी  नादान से  की दोस्ती क्या   न जाने क्यों कोई सहमत नहीं है बहुत मुश्किल हुई है रहबरी क्या   चलो  इक  प्यार का  मक़्तब बनाएं मुहब्बत की नहीं खलती कमी क्या   तलाशे   जा  रहे  जुगुनू  जहां पर चिरागों  में   नहीं  है …

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मुहब्बत का सिला देना

मुहब्बत का सिला देना बिना  माँगे  दुआ  देना   ग़मों की भीड़ कितनी हो ख़ुशी   को   रास्ता  देना   बड़ी  नेकी  सदाक़त है किसी को आसरा देना   ख़ुदा मिल जाय तो लोगो मुझे  उसका  पता  देना   जिसे भी बदगुमानी है उसे कुछ हौसला देना    भला करना भला होगा …

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नहीं था मुंतजिर वह

नहीं था मुंतजिर वह इस घड़ी काजिसे चस्का लगा था रहबरी का मुहब्बत एक जज़्बा है नदी कामगर अंजाम भी है ख़ुदकुशी का बज़िद बच्चे कभी होते नहीं हैउन्हें अहसास है क्या मुफलिसी का हमारे साथ कब तक है सफर मेंभरोसा ही नहीं है ज़िन्दगी का ख़बर उनकी न कुछ अपना…

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नहीं था मुंतजिर वह

नहीं था मुंतजिर वह इस घड़ी काजिसे चस्का लगा था रहबरी का मुहब्बत एक जज़्बा है नदी कामगर अंजाम भी है ख़ुदकुशी का बज़िद बच्चे कभी होते नहीं हैउन्हें अहसास है क्या मुफलिसी का हमारे साथ कब तक है सफर मेंभरोसा ही नहीं है ज़िन्दगी का ख़बर उनकी न कुछ अपना…

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आईना मुस्कुराता

आइना मुस्कराता हुआ रह गयातेरी सूरत में पहले सा क्या रह गया उसने देखा मुझे फिर नज़र फेर लीमैं उसे देखता- देखता रह गया जब मिली एक नज़र नज़र दूसरीफिर बता और कहने को क्या रह गया मैंने मेहनत से तक़दीर तब्दील कीथा लकीरों में लिक्खा,धरा रह गया झूठ की…

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आईना मुस्कुराता

आइना मुस्कराता हुआ रह गयातेरी सूरत में पहले सा क्या रह गया उसने देखा मुझे फिर नज़र फेर लीमैं उसे देखता- देखता रह गया जब मिली एक नज़र नज़र दूसरीफिर बता और कहने को क्या रह गया मैंने मेहनत से तक़दीर तब्दील कीथा लकीरों में लिक्खा,धरा रह गया झूठ की…

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ज़रुरत आदमी को

ज़रूरत  आदमी को चैन से जीने कहां देगी हमारी ज़िन्दगी हर रोज़ कितने इम्तिहां देगी   हक़ीक़त आइने से छिप नहीं सकती यही सच है नज़र की मानिये हर हाल ये सालिम बयां देगी   सफर लम्बा अगर है तो अधिक असबाब लाज़िम है थकन के वक़्त रस्ते में ख़ुदी इक साइबां…

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मुब्तला दिल क्यों

मुब्तला दिल क्यों गुनाहों में रखूंबस ख़ुदा की नेक राहों में रखूं हम फक़ीरों के लिए सब एक हैंनाम किसका ख़ैरख़्वाहों में रखूं वक़्त ने जो ज़ुल्म सूरत पर कियेआइने को भी गवाहों में रखूं मां के क़दमों से नहीं बेहतर जगहसर मैं अपना इन पनाहों में रखूं…

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Blog Posts

एक शिकवा है ज़िन्दगी से मुझे
छीन ले जाएगी मुझी से मुझे

बेख़याली का इक ख़्याल हूं मैं
कौन अपनाएगा ख़ुशी से मुझे

मुझको ख़ुद्दार कर गयी यारो
प्यार है तब से मुफलिसी से मुझे

इस बुढ़ापे में इन्तहा डर है
मेरे…

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मुसीबत आपने भी मोल ली क्या
किसी  नादान से  की दोस्ती क्या
 
न जाने क्यों कोई सहमत नहीं है
बहुत मुश्किल हुई है रहबरी क्या
 
चलो  इक  प्यार का  मक़्तब बनाएं
मुहब्बत की…
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चन्द घड़ियां बवाल करती हैं
और सदियां मलाल करती हैं

फ़क़्र है हमको इस बुढ़ापे में
बेटियां देखभाल करती हैं

शक्ल पर वक़्त की लकीरें भी
आइने से सवाल करती हैं

बिन कहे भी हमारी ख़्वाहिश का
सिर्फ़ मांएं ख़याल…

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थकन के बाद भी चलते रहो इसरार करती हैं
मुझे बैसाखियां मेरी बहुत लाचार करती हैं

कभी हालात लमहे में बदलते हैं ज़माने के
कभी सदियां किसी अंजाम से इन्कार करती हैं

कभी कुछ सूरतें पत्थर बनी सी देखते रहिए
कभी कुछ पत्थरों…

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