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Sukhanvar International's Posts (7)

आसमां को चीर कर देखूँ न क्यों उस पार मैं
ख़्वाब को कैसे हक़ीक़त कह दूँ आख़िरकार मैं

ज़िन्दगी बाक़ी है, अपने अज़्म पर है ऐतबार
जीत की उम्मीद है तो मान लूँ क्यों हार मैं

बाप हूँ तो बेटियों की प्यास क्यों समझूँ नहीं
माँगकर गंगा को शिव से क्यों न दूँ उपहार मैं

अब्र के टुकड़े से भी घटता है जब सूरज का ताप
ग़म के बादल हैं घिरे तो क्यों रहूँ बेजार मैं

मौत की चादर में लिपटी ज़िन्दगी की लाश को
देखकर ग़मगीं हुआ, रोया भी बारम्बार मैं

बन के घर बीमारियों का हो गया हूँ चारागर
जानता हूँ अब हर इक दुख दर्द का उपचार मैं

हर ख़बर हो ख़त्म जिसपर हो के उसपर ही शुरुअ
उसके हर इक हाल को क्यूँ कर करूँ अख़बार मैं

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ग़मगीन थे जो पाँव में ज़ंज़ीर देखकर
ख़ुश हैं हमारे हाथ मे शमशी र देखकर

बदज़ह्नियत क़ुबूल नहीं थी हमें मगर
बदले हैं हम तो वक़्त की तासीर देखकर

देखे हसीन ख़्वाब कई मैंने इन दिनों
हैरान हूँ अब उनकी ही ताबीर देखकर

खमोश झील में कोई पत्थर न फेंक दे
शादां बचे हुबाब की तक़दीर देखकर

मुंसिफ़ ने जब दिया था मेरे हक़ में फ़ैसला
ग़मगीं हुआ फ़रीक़ की मैं पीर देखकर

करना है इंतज़ार उन्हें जो भी होंगे ख़ुश
दीवार पर टँगी मेरी तस्वीर देखकर

बसने को इसमें लोग हैं तैयार आजकल
ख़ुश हैं हमारी प्यार की जागीर देखकर

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कहानी के नज़रिये से
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जैसा कि मैं कहता रहा हूँ, कहानी लिखना कहानी पढ़ने से आता है। और अच्छी कहानी लिखना सब कुछ पढ़ने से आता है। अगर आपको मेरी कहानियाँ कथ्य और शैली दोनों में अलग लगती हैं तो मैं कहूँगा इसके पीछे और कुछ नहीं " यह सब कुछ पढ़ना" है। कहानी ज्ञान का अन्तिम मिश्रण है।
केमिस्ट्री की हॉफ रेडोक्स रिएक्शन हों, या कुआंतम फिजिक्स की सृष्टि में निहित चार आधारभूत शक्तियां, बिज़नस की डबल एंट्री, इंजीनिरिंग का डेड या डायनामिक लोड, या बायोलॉजी की एंडोक्राइन ग्लैंड्स, हर कुछ अन्तत: कहानी में जाकर मिल जाते हैं। और एक अलग नजरिया हासिल होता है। मसलन, प्रकृति ने फल मनुष्य के खाने के लिए नहीं, पेड़ों के जीवित रहने के लिए पैदा किये हैं। भीषण मौसम में पूरा द्रव उनमें बचा कर रखता है एक वृक्ष, और वर्षा आने से पहले पूरा द्रव चूस कर बीज धरती पर छोड़ देता है। मनुष्य का नजरिया कुहरे से ढका है। वह समझता है इस प्रकृति में वह विशिष्ट है, लाडला है, बहुत कुछ उसकी ज़रूरतों को ध्यान में रख कर हुआ है।
आज बात अर्थशास्त्र की, कहानी के नज़रिये।
मैं इसे 'न्याय' नहीं कहूँगा, क्योंकि राजनीतिक शब्दावली से बात अपने मतलब से इधर उधर निकल सकती है। मैं गरीबों के हाथ में ज़्यादा पैसे देने की अर्थव्यवस्था का पक्षधर रहा हूँ। मैं बीसों साल से कह रहा हूँ, एक ईंट लगाने वाले कारीगर को उतने ही पैसे मिलने चाहियें जो एक बैंक के कैशियर को मिलते हैं। सीधी ईंटों की दीवार बनाना, बैंक में नोट गिनने से कहीं ज़्यादा कठिन है। खैर, किसी ने आखिर सोचा, राजनीतिक मजबूरी में ही सही, कि बजट का दस बारह प्रतिशत सीधा गरीबों के हाथ में जाना चाहिए। काम, नौकरी बगैरा अलग मुद्दे हैं। आज भी बहुत सी जगह लोग बैठे हैं सरकारी दफ्तरों में, जो काम क्या कर रहे हैं, कुछ समझ नहीं आता। कल पासपोर्ट ऑफिस में एक ' एग्जिट' काउंटर देखा, जिस पर एक महिला बैठी फीडबैक फॉर्म भरने की हिदायत दे रही थी। जब मैंने कहा- यह तो ऑप्शनल है? तो वह चिढ कर बोली- हाँ, ऑप्शनल है, आराम से बैठ कर भरिये।
आखिर क्या होगा, इतनी सारी रकम एक गैर- उत्पादक तरीके से खर्च करने पर। पहले तो एक बात समझना जरूरी है कि मुद्रा चलन के दायरे में तरल गुण रखती है। तभी तो हम कहते रहे हैं कि ऊपर से डालो तो नीचे तक नहीं पहुंचती है बीच में ही हज़म हो जाती है। पानी नीचे से जल्द गर्म होता है क्योंकि गर्म होकर पानी के अणु ऊपर भागते हैं, और पूरा पानी जल्दी गर्म हो जाता है।
अब यह जो तीन चार लाख करोड़ रुपये हर साल गरीबों के हाथ में जायेगा (अगर ऐसा हुआ तो), यह व्यवस्था में तेज़ी से घूमेगा, क्योंकि उन गरीबों के पास इसे जोड़ने, रखने की सामर्थ्य नहीं है। जायेगा और आयेगा। अर्थव्यवस्था में तेज़ उछाल आएगा। दूसरे, इसका अधिकांश हिस्सा ग्रामीण इलाकों में जायेगा। गरीब, मज़दूर, छोटे किसान, छोटे दूकानदार जो बैठ कर एक निराशा की जकड़ में आ गए थे, उनमें एक जीवन ऊर्जा का संचार होगा। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को त्वरण मिलेगा।
और जो मौद्रिक वितरण का उल्टा पिरामिड बन गया था, उसका आकार थोड़ा बदलेगा। उसमें स्थायित्व पैदा होगा।
भारत की कहानी में एक बदलाव ज़रूर आएगा। आगे क्या होगा, नहीं कह सकते, क्योंकि यह कहानी किसी एक लेखक की कलम से नहीं लिखी जा रही है। हम सब इसके रचियता हैं। 

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सिर्फ़ हँस कर नहीं दिखाओ मुझे
जी रहे हो, यक़ीं दिलाओ मुझे

झूठ की उम्र कम ही होती है
हो भले तल्ख़ सच बताओ मुझे

तुम तो इतने करीब हो उसके
ज़िन्दगी से कभी मिलाओ मुझे

मेरे ख़त ही हैं ज़िन्दगी मेरी
ख़ुद ही जल जाएँगे जलाओ मुझे

दाम ख़ुद ही अदा न कर पाओ
क़ीमती इतना मत बनाओ मुझे

तुमको ख़ुश देखकर ख़ुशी होगी
आज़माओ  हुनर,  रुलाओ मुझे

ख़ामुशी ढूँढ़ ले सदा शायद
तुम जहाँ हो वहीं बुलाओ मुझे

अर्श से फर्श पर पड़ा हूँ मैं
झुक के उठ पाओ तो उठाओ मुझे

आसमां कह के मत अज़ीम करो
तुम ज़मीं हो अगर, झुकाओ मुझे

शेषधर तिवारी, प्रयागराज

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ज़िन्दगी तूने ही दी थी, ले के मेरा क्या लिया
ख़ुदकुशी का मुझसे नाहक़ फ़ैसला करवा लिया

बौखलाए इस क़दर उसकी तमाज़त से कि ख़ुद
अपने साये में ही हमने धूप को बैठा लिया

रेत को पानी बताने की ख़ता सहरा ने की
तो सराबों ने हमारी प्यास से बदला लिया

रुख़्सती पर जो लिखा था वो सुनाना था मगर
मन ही मन वो गीत तेरा मैंने ख़ुद ही गा लिया

वो फ़िदा ऐसे हुए इक रोज़ अपने हुस्न पर
ख़ुद को आईने में देखा और फिर बोसा लिया

माहे कामिल अपने घर का तूने देखा ही नहीं
और ख़ुद को चौदवीं के चाँद से बहला लिया

जब ख़ुदा करने लगा तक़सीम अपनी नेमतें
धूप ने अपनी सुकूनत के लिए साया लिया

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तू कभी मिल जाये तो इस बात का चर्चा करूँ
हो गिला तुझसे ही तो किससे ख़ुदा शिकवा करूँ

हर सुतूं मिस्मार है अब इस हिसारे जिस्म का
रूह जाने को ही राज़ी है नहीं तो क्या करूँ

धूप के मासूम टुकड़ों की है मुझसे आरज़ू
साथ उनके जब रहूँ तो उनपे मैं छाया करूँ

झुर्रियाँ हैं फ्रेम पर तस्वीर अब भी है जवान
क्यों हिसाबे वक़्त करके मैं तुझे बूढ़ा करूँ

रो पड़ूँगा यूँ  भी  तुझको आबदीदा  देखकर 
इसलिए  सोचा  है  तेरे अश्क  मैं  रोया करूँ

नीमकश अबरू तुम्हारी जब करे हैं गुफ़्तगू
चाहता हूँ ज़द पे उनकी सिर्फ़ मैं आया करूँ

प्यार  की बस इब्तिदा  है  इंतिहा होती  नहीं
इसलिए  बेहतर  है तुझको दूर से देखा करूँ

कोई हद नाकामयाबी की बता मुझको ख़ुदा
आख़िरश कब तक मैं अपने आप को रुस्वा करूँ

मुस्कराना भी जो फ़ेहरिस्ते गुनह में है रक़म
तो मैं  एहसासे  समीमे  क़ल्ब  से तौबा करूँ

साहिबेइस्मत  परीपैकर  खड़ी  हो  सामने
तो शगुफ़्ता गुल लिए क्यों और का पीछा करूँ

मार दूँ अपनी अना को बेंच दूँ अपना ज़मीर
ज़िन्दगी तेरे लिए क्या क्या मैं समझौता करूँ

जब जहां की शै सभी फ़ानी हैं तो इनके लिए
क्या मुनासिब है कि अपनी रूह का सौदा करूँ

शेषधर तिवारी, इलाहाबाद

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