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कविता

All Posts (18)

गीत

जो उड़ना है तुझे ऊंचा परों को खोल के रख।
कसौटी वक्त की है हौसलों को तोल के रख।।

अभी आग़ाज़ है तेरा बहुत कुछ सीखना है।
कमर कसनी अभी बाकी है मुट्ठी भींचना है।
भले हालात हों कैसे भी बस ये सोच ले तू।
यही ज़िद है यही है रार बस अब…

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उठो धनुर्धर! (गीत)

उठो धनुर्धर! बैठ गए क्यों?
उठो पार्थ! क्यों बैठ गए हो?
रण तो पूरा बचा हुआ है।

समर भूमि में वीर तुम्हारे,
मन में अंतर्द्वंद चल रहा।
भाव-हृदय से टकराए हैं,
नयन नीर विष्यन्द चल रहा।

उठो! तुरत गांडीव उठाओ, वीर!…

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ये हिज्र है ना विसाल है
बस मुहब्बतों का ज़वाल है
तुझे चाहता है कोई आज भी
बस उन्ही चाहतों का सवाल है

तुझे देख ले जो कोई शब ओ सहर
तेरी इनायतों के हो पेशतर
ये जो गुलों की हैं खुशबुएँ
तेरे संदली हुस्न की मिसाल…

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कुछ तुम से....

कुछ कहना था तुम से
वो हर बार
तुम्हारे दरवाज़े के
आगे से निकलते हुए
उस बड़े से ताले को
देखा था तो...
तुम्हें याद किया था।
वो उस दिन
किसी पुरानी सहेली ने
पिछली गली में छूटी
तुम्हारी बातों…

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कविता

भौतिकता

कितने अच्छे थे वो लम्हे जब सपने छोटे होते थे ;

छोटी खुशियाँ, छोटे ग़म थे, हम संग संग हँसते रोते थे ;

आज…

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कविता

अजन्मी बेटी की गुहार
******************
जीने का अधिकार मुझे दे.....
ओ मेरी मैया, सुन मेरी मैया,
बस थोड़ा सा प्यार मुझे दे.....

माटी से
और रंगों से
ईश्वर मुझको बना रहा है ;
तू भी कर इसमें सहयोग -
वरना…

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कविता

जड़---

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धरती के अन्दर

आँख खोलते ही

वो इठलाती है

बाहें  फैलाती है

और गर्व से

फूल जाती है

कि उस से ही है

पेड का जीवन

पर उसका अपना

वज़ूद क्या है

आसमान से…

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प्रेम के वशीभूत

प्रेम के वशीभूत
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तुम्हारी यादों में
तुम्हें सोचते हुए
पता न चला
कब आँख लगी
कब ख़्वाबों को पर मिल गये।

अचानक ही
एक स्पर्श हुआ
चिर परिचित
नींद गायब
आँखों में चमक उतर आई…

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धूल का बिस्तर

मुबारक फ्लैट आलीशान तुमको
मुबारक फ्लैट के वो लग्ज़री कमरे
मुबारक सुर्ख मखमल का शबिस्तां भी तुम्हें
मगर ज़रदार इंसानो
तुम अपने मखमली बिस्तर पे सो जाने से पहले
उसे हाथों से छूकर देखना
महसूस करना, सोचना
ये सच में लाल मखमल…

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दरियाओं के संग बहता था,
अपने अंदर खुश रहता था,
हर ग़म को हँस कर सहता था,
गीत, ग़ज़ल नज़्में कहता था।

जैसे हाथों बीच समंदर,
जाने कौन था मेरे अंदर।

आसमान पर नज़र टिका कर,
गहरे पानी भीतर जा कर,
सुख दुख के कुछ मोती…

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कह मुकरियां

हर पल मेरा तन मन लूटे
वादे करता रहता झूठे
मीठी बातें कटु व्यवहार
क्यों सखि साजन? नहीं संसार।

रूप रंग का है बस लोभी
बनता याचक पूरा भोगी
बांधे झूठे सभी…

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गुड़ियों से खिलौनों से
मां की गोद के नरम
बिछौनों से
चूरन की गोली से
स्कूल कॉलेज के
चुपचाप कोनों से
जाने कब हम निकल कर
कहीं दूर खड़े हो गए...!
हम आज कुछ और
बड़े हो गए...!…

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यादें

पुरानी यादों को
किसी सीली कोठरी के
बंद दरवाजों के पीछे
भारी संदूकों के भीतर
दफ़न ही रहने दो
खुल गए तो
तबाही लाएंगे
बेहतर है
इन्हें भूला ही रहने दो।

तुम क्या खोजना चाहते हो
क्या पाना है…

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