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कविता

All Posts (11)

कुछ तुम से....

कुछ कहना था तुम से
वो हर बार
तुम्हारे दरवाज़े के
आगे से निकलते हुए
उस बड़े से ताले को
देखा था तो...
तुम्हें याद किया था।
वो उस दिन
किसी पुरानी सहेली ने
पिछली गली में छूटी
तुम्हारी बातों को
दोहराया था तो...
तुम्हें याद किया था।
यूँ ही चलते चलते
रोज को भागदौड़
दिन की आपाधापी
शाम की थकान के बीच
कुछ काम याद आया था तो...
तुम्हें याद किया था।
कुछ बीती हुई बातों
कुछ छूटे हुए रास्तों
आज तक मचलते
जज्बातों के बीच
एक वादा याद आया था तो...
तुम्हें याद किया था।
सच, किया था।
सूफ़ी

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कविता

भौतिकता

कितने अच्छे थे वो लम्हे जब सपने छोटे होते थे ;

छोटी खुशियाँ, छोटे ग़म थे, हम संग संग हँसते रोते थे ;

आज न जाने कैसे सपने देख रहे हैं नैन हमारे ?

कि नींद उचट जाती रातों में, छिन रहे हैं चैन हमारे ;

इक छोटे से घर का सपना तब्दील हो गया इमारत में,

अमन चैन की जगह माँग रहे हम बंगले-गाड़ी इबादत में ;

घडी दो घड़ी की गुफ्तगू में भी बातें सूद-ज़ियाँ की होती हैं,

कितनी लागत? क्या नुक्सान-नफ़ा? इसी पर चर्चा होती है;

प्यार-मुहब्बत, रिश्ते-नाते, तुल रहे दौलत संग पलड़े में,

कौन सा पलड़ा भारी है? कौन पड़े इस झगडे में?

भौतिकता के दौड़ में रह गयी है पीछे नैतिकता,

कौन भला इस कलियुग में सिक्कों के मोल नहीं बिकता?

©पल्लवी मिश्रा, दिल्ली।

 

 

 

 

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कविता

अजन्मी बेटी की गुहार
******************
जीने का अधिकार मुझे दे.....
ओ मेरी मैया, सुन मेरी मैया,
बस थोड़ा सा प्यार मुझे दे.....

माटी से
और रंगों से
ईश्वर मुझको बना रहा है ;
तू भी कर इसमें सहयोग -
वरना मेरे जीवन का
हो न सकेगा संयोग -
तेरे लहू और दूध बिना -
कैसे विकसित हो पाऊँगी ?
तुझसे रोकर करूँ प्रार्थना -
धड़कन का अवलंब मुझे दे,
साँसों का आधार मुझे दे.....

मैं आऊँगी तो
तेरे घर-आँगन में
खुशियाँ ही बरसाऊँगी -
तेरे दुःख में, तेरे सुख में,
मैं तेरा साथ निभाऊँगी -
सब अपनी अपनी किस्मत लेकर
इस दुनिया में आते हैं -
और अपना अपना जीवन जी कर
इस दुनिया से जाते हैं -
है करबद्ध विनती मैया
मेरे हिस्से का संसार मुझे दे.....

यह मत कहना कि
मुझको लाने से
तुझे दुनियावाले रोक रहे हैं ;
तू भी तो एक बेटी है
क्या मेरे लिए लड़ न सकती ?
अपनी ज़िद से या मनुहार से,
अपने हक़ से या तनिक प्यार से,
उनका मन परिवर्त्तन
कर न सकती ?
इस दुनिया में आने का
बस मौका एक बार मुझे दे.....

यह तेरा ही निर्णय होगा
कि तेरी कोख़ में
रहूँ मैं ज़िन्दा -
कहीं ऐसा न हो
कि कल मुझको खो कर
ईश्वर के सम्मुख
होना पड़े तुझे शर्मिन्दा -
और नहीं कुछ चाहूँ तुझसे -
और नहीं कुछ माँगूँ तुझसे -
बस अपनी काया का थोड़ा
रंग, रूप, आकार मुझे दे.....

और कहो माँ
क्या मुझे मिटा कर
तू इक पल चैन से रह पाएगी ?
क्या इस पाप का भारी बोझ
अपने हृदय पर सह पाएगी ?
तेरी ममता पर अटकी
है मेरी साँसों की डोर ;
मजबूती से थामे रहना -
मातृत्व का अपमान न करना -
माँ तुझको तेरी माँ की कसम
अपना घर परिवार मुझे दे.....

कल जब तुझसे उस दुनिया में
सृष्टिकर्त्ता पूछेगा -
कि क्यों तूने उसकी कलाकृति को
बनने से पहले नष्ट किया ?
सच कहना माँ क्या तुझको
कुछ इसका उत्तर सूझेगा ?
तू भर जाएगी ग्लानि से -
फिर कैसे नजर मिलाएगी तू
अपनी माँ और नानी से -
फूल भले रख अपने हिस्से
बस काँटों का हार मुझे दे.....

ओ मेरी मैया, सुन मेरी मैया
जीने का अधिकार मुझे दे.....
बस थोड़ा सा प्यार मुझे दे....

©पल्लवी मिश्रा, दिल्ली।

 

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कविता

जड़---

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धरती के अन्दर

आँख खोलते ही

वो इठलाती है

बाहें  फैलाती है

और गर्व से

फूल जाती है

कि उस से ही है

पेड का जीवन

पर उसका अपना

वज़ूद क्या है

आसमान से कम

क्या होगा!

बाहें पसारती है

फल फूल पत्तों से

खुद को सजाती

संवारती है

फिर इन्तज़ार करती है

कोई आयेगा उसे सराहेगा

उसके गुण गायेगा

हाँ बहुत लोग आते हैं

फूलों की महक

फलों के स्वाद

पत्तों की घनी छाया के

गीत सुनाते हैं

मंदिरों तक मे यही

पूजे जाते हैं

और वो धरती मे

सिकुडी सिमटी

पेड का बोझ उठाये

जमीन से बाहर आने को अधीर

क्यों बोझ उठाये

क्यों अपनी आज़ादी गंवाये

तभी कहीं से आती है

एक आवाज़

जड़ है तो पेड है

बस इतने मे ही

पा लेती है अपना अस्तिव

जब हो जाता है ये बोध

फिर उसे अपना कर्तव्य

नही लगता बोझ

और ये जड माँ है

माँ है तो जहाँ है

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प्रेम के वशीभूत

प्रेम के वशीभूत
==========

तुम्हारी यादों में
तुम्हें सोचते हुए
पता न चला
कब आँख लगी
कब ख़्वाबों को पर मिल गये।

अचानक ही
एक स्पर्श हुआ
चिर परिचित
नींद गायब
आँखों में चमक उतर आई ।

मैं तुम्हें चूमने लगा
प्यार करने लगा
आलिंगन बद्ध रहा
कब तक? पता नहीं
मदहोश थे ख़ुशी के आँसू।

स्वप्न टूटा
तुम नहीं थी
यक़ीन न हुआ
यक़ीन होता भी कैसे
तेरी ख़ुश्बू तो वहाँ मौज़ूद थी।

ऐसा ही होता है
जब से तुम उस पार गई हो
मुझे उदास नहीं देख सकती
इसलिए तो आती हो तुम
प्रेम के वशीभूत, वो वचन निभाने...।
~कुमार ठाकुर

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धूल का बिस्तर

मुबारक फ्लैट आलीशान तुमको
मुबारक फ्लैट के वो लग्ज़री कमरे
मुबारक सुर्ख मखमल का शबिस्तां भी तुम्हें
मगर ज़रदार इंसानो
तुम अपने मखमली बिस्तर पे सो जाने से पहले
उसे हाथों से छूकर देखना
महसूस करना, सोचना
ये सच में लाल मखमल है
या उस मुफ़लिस बदन के खून के क़तरे बिछे हैं शीट पर
जिसे सोता हुआ तुम देखते हो धूल के बिस्तर पे
अपने फ्लैट के नीचे ।

समर मुरैनवी

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दरियाओं के संग बहता था,
अपने अंदर खुश रहता था,
हर ग़म को हँस कर सहता था,
गीत, ग़ज़ल नज़्में कहता था।

जैसे हाथों बीच समंदर,
जाने कौन था मेरे अंदर।

आसमान पर नज़र टिका कर,
गहरे पानी भीतर जा कर,
सुख दुख के कुछ मोती पाकर
तन्हाई में नग्में गाकर,

जीता जैसे मस्त कलंदर,
जाने कौन था मेरे अंदर।

भरी जवानी में मद माकर,
पढ़ के प्रेम का ढाई आखर,
सपने आँखों बीच सजाकर,
मन सपनों के साथी पाकर,

बन बैठा था एक सिकंदर,
जाने कौन था मेरे अंदर।

उम्र की सीढ़ी चढ़ कर सीखा
वक़्त के साथ फिसल कर सीखा
गिर कर और संभल कर सीखा
जीवन आधा जीकर सीखा

बुरा है क्या और क्या है सुन्दर,
जाने कौन था मेरे अंदर।

आँख खोल कर ढूंढा मैंने,
आँख मूँद कर देखा मैंने,
दे आवाज़ बुलाया मैंने,
फिर भी उसे ना पाया मैंने,

सच मुच था या जादू मन्तर,
जाने कौन था मेरे अंदर।

-अखिलेश कृष्णवंशी

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कह मुकरियां

हर पल मेरा तन मन लूटे
वादे करता रहता झूठे
मीठी बातें कटु व्यवहार
क्यों सखि साजन? नहीं संसार।

रूप रंग का है बस लोभी
बनता याचक पूरा भोगी
बांधे झूठे सभी सम्बन्ध
क्यों सखि साजन? नहीं मारिन्द।

मुश्किल में जो राह बताए
बिन मांगे ही जान लुटाए
प्रेम त्याग ही उसका चरित्र
क्यों सखि साजन? नहीं सन्मित्र।

बोल बोल कर राग सुनाए
बारिश देखे पगला जाए
मटक मटक कर कूदे खूब
क्यों सखि साजन? नहीं मंडूक।
डॉ सूफ़ी

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गुड़ियों से खिलौनों से
मां की गोद के नरम
बिछौनों से
चूरन की गोली से
स्कूल कॉलेज के
चुपचाप कोनों से
जाने कब हम निकल कर
कहीं दूर खड़े हो गए...!
हम आज कुछ और
बड़े हो गए...!
एक आशियाने की तलाश में
सर टिकाने के हसरत लिए
किसी शाने की तलाश में
तेरी पनाहों तक आ कर भी
रीते ही लौट गए
हम आज कुछ और
बड़े हो गए...!
जाने क्या कशिश है
जाने कैसी है मिठास
कुछ लम्हे जलते बुझते
कुछ पल बहुत खास
पुरसुकून तेरी चाहत
खिलता कोमल सा उजास
वो कदम दर कदम
वो हाथों में हाथ
और कुछ चाहिये क्या
तेरी बातों के साथ
जाने कितनी राहें
बस यूं ही मुड़ गए...!
हम आज कुछ और
बड़े हो गए...!

डॉ सूफ़ी

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यादें

पुरानी यादों को
किसी सीली कोठरी के
बंद दरवाजों के पीछे
भारी संदूकों के भीतर
दफ़न ही रहने दो
खुल गए तो
तबाही लाएंगे
बेहतर है
इन्हें भूला ही रहने दो।

तुम क्या खोजना चाहते हो
क्या पाना है तुम्हें
वो सब कदमों में है तुम्हारे
तुम्हारे अपने
तुम्हारे सपने
सारी आशाएं
सारे उजास
तुम्हारी चाहत
तुम्हारी प्यास
सब तो पा लिया तुमने
अब क्या है तलाश...
बस अब भुला दो
वो कड़वाहट
वो बेकार आस
बस सब भूला ही
रहने दो।

अब तो खुशी से
थाली सजाओ
लौट आये हैं मीत
उत्सव मनाओ
गाओ खुशी से
गीत गुनगुनाओ
प्रियतम की बाहों में
रतियाँ बिताओ
खुशियां मुश्किल से
मिलती हैं
उन्हें सहेजो उन्हें सजाओ
वो जो करारी सी मार
विरह ने मारी थी
वो ज़हरीली सी घात को
बस भूल जाओ
सब भूल जाओ।
डॉ सूफ़ी

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बस इतना सा समाचार है

घूरे पर बैठा बच्चा
खाने को कुछ भी बीन रहा है
लगता है विधिना से लड़कर
अपना जीवन छीन रहा है
इसको भी जीना कहते हैं
मन में आता यह विचार है
बस इतना सा समाचार है

अपने बालों के झुरमुट से
जाने क्या वह खींच रही है
बूढी दादी गिने झुर्रियाँ
गले मसूढ़े भींच रही है
जीने की इच्छा तो मृत है
मरने तक ज़िंदगी भार है
बस इतना सा समाचार है

अब की बार
फसल अच्छी हो तो
घर में कुछ काम कराऊँ
प्लास्टिक फटी हुई है छाजन की
फिर एक नयी लगवाऊँ
सीलन से सब खाँस रहे हैं
छोटी बिटिया को बुखार है
बस इतना सा समाचार है

बड़की की शादी करनी है
कुछ उधार तो लेना होगा
भूखे पेट भले रह लेंगे
पर दहेज़ तो देना होगा
वर्ना रिश्तेदार कसेंगे ताने
"बिटिया बनी भार है"
बस इतना सा समाचार है

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