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कहानी

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कहानी

ज़िंदादिल....

उस्ताद प्रोफेसर..मुजतबा हुसैन,
महफ़िलों के ग़ुरूर का बाइस,अदब की दुनियां के नामी गरामी शायर, oxford यूनिवर्सिटी में ज़बान के प्रोफ़ेसर,( professor de lingua) आगरा के बाशिंदे थे,इतने ख़ूबसूरत के जहां से भी गुज़र जाते थे हर ख़ास-ओ-आम को मुतास्सिर कर सकने का दम रखते थे।
कुछ दिनों से थके-थके से लगने लगे थे।शायद कुछ बीमार रहने लगे थे।उनकी शरीक-ए-हयात का गए साल,इंतकाल हो गया था और बहुत बड़ा ख़ानदान होते हुए भी,अकेला से महसूस करते थे।हर वक़्त जिंदादिल इनसान को थकते और टूटते हुए देखा जा सकता था।लेकिन सब कुछ समझते हुए भी वो हालात को नज़र अंदाज़ किये रहते थे। यूँ तो वो किसीसे भी तवक़्क़ो कभी भी नहीं रखते थे,पर लोगों के तग़ाफ़ुल का अंदाज़ा उनको हो रहा था।
किसीसे भी गुफ़्तगू के दौरान कभी शिकायत नहीं करते थे के फलां-फलां शायर उनके क़लाम चोरी करके महफ़िलों में पढ़ रहे थे ।ज़ाहिरी तौर पर कुछ कहते ही नहीं थे पर उनके जी को लगती थी और सोचा करते के 2 कौड़ी के लोग मसनद नशीं हो गए जो एक मिसरा सीधा नहीं कह सकते थे मोहतरम हो गए दिखाई देते थे,उनको हसद कभी किसीसे नहीं हुआ और वो इस बात को पसंद भी नहीं करते थे,उनका मानना था,जो जहां है अपनी किस्मत से है और हां शाइरी को तरन्नुम से कहे जाने के सख़्त ख़िलाफ़ थे...
एक रोज़ एक orgniser उनसे मुलाक़ात करने आया,उसका किसी सिलसिले में लंदन आना हुआ था और वो उनसे मिलने जा पहुंचा था,ख़ैर उनके घरवालों ने उसकी ख़ासी आवभगत की,उसने उनको कुछ शेर सुनाने को कहा लेकिन लाख़ इसरार करने पर भी राज़ी नहीं हुए बहरहाल उसको ख़ाली ही लौटना पड़ा और उसने अपने तरीके से उनकी एक तस्वीर अपने मन में बैठा ली, और भारत आकर अफ़वाह उड़ा दी के वो पागल हो गए हैं,उन तक भी बात पहुंची तो वो हक्के-बक्के से रह गए ।। और सोचने पर मजबूर हुए के कोई भी किसीको अपने तेवरऔर अपनी सोच के मुताबिक ही तौलता है बस उन्होंने ख़ुद को अपने ही हिसार में क़ैद कर लिया,वो आज भी हैं लेकिन अपने आप में निहायत ख़ुश और आज भी ग़ज़लें कहते हैं लेकिन वहीं जहां उनका जी चाहता है....
उर्मिला माधव..

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लिछ्मी का हाथ

लिछ्मी का हाथ
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लिछ्मी कतई मानने को तैयार नहीं थी।
" नहीं शंभू, नहीं ! तेरा मन करे तो यहाँ आ जाया कर। नहीं तो कोई बात नहीं। अब इन हाथों में जान नहीं है रे!"
सबूत के लिए उसने अपना दायां हाथ शंभू के आगे कर दिया, और उसका सिर ना में हिलता रहा।
शंभू उसकी हथेली को सहलाता हुआ बोला, " अरे बावली, मैं इन हाथों को मशक्कत कोई ना करने दूँगा। मेरे साथ रहेगी तो तू सुख भोगेगी, सुख!"
" क्या है ना शंभू, जब तक औरत मर्द के क़ब्ज़े में नहीं आती वह ऐसे ही मिन्नत करता है.. और बस एक बार उसकी हुई तो हैवान हो जाता है। जानवर सा टूट टूट के पड़ता है। मैं बोलती हूँ ना, अब मुझ में जान नहीं रही।"
शंभू उसकी अँगुलियों से खेल रहा था।
"बिरजू भी शुरू में ऐसे ही बोलता था। पर मुझे याद है वह दिन..."
उसने आँखें ऊपर करके शंभू की आँखो में देखा।
" उस दिन जो मेरा हाथ ज़रा सा काँप जाता तो बिरजू की जगह मेरी लाश पड़ी होती। टुकड़े टुकड़े करता वो मेरे। ये तो दुर्गा माई ने पता नहीं कहाँ से मुझे ताक़त दे दी थी.... पर अब नहीं शंभू, अब इन हाथों में जान नहीं है।"
शंभू ने झटके से लिछ्मी का हाथ छोड़ दिया। ज़मीन को घूरता रहा और फिर उठ कर चला गया। दोबारा कभी नहीं आया।

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एक लघुकथा: अस्थिचर्ममय
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पिछले हफ्ते एक फ़ेसबुक मित्र ने मेरे संदेश बॉक्स में अपनी एक लघुकथा भेजी, संदेश के साथ।
संदेश था- मान्यवर आपकी कहानियाँ अच्छी होती हैं, मगर आप उनमें हिन्दी ज़्यादा लिखते हैं, पढ़ने में कठिनाई होती है, पर आप लिखते बहुत अच्छा हैं। आपने मेरी भी कुछ लघुकथाओं को लाइक किया है। मैं अपनी एक लघुकथा भेज रही हूँ, कृपया पढ़ कर अपने विचार बतायें।
साहित्यिक रचनाओं की अत्यधिक प्रशंसा मैं ईष्ट नहीं समझता। एक तो खोखली लगने के डर से, दूसरे अतिप्रशंसा लेखक को भ्रमित कर सकती है। मामूली या वाहियात रचना की वाहवाही तो मुझे साहित्यिक अपराध सा लगता है। पर स्वीकारना चाहूँगा कि कई बार उऋण होने के लिए मैंने कुछ कहानियों को बिना पढ़े लाइक किया है।
बहरहाल मैंने इन्हें जवाब दिया- आप लिखते रहिए, और प्रेमचंद की सभी कहानियाँ पहले पढ़िए। आप के लेखन में परिपक्वता आएगी।
इनका तुरंत जवाब आया- देखिए मैं चाहे जिस को नहीं पढ़ती हूँ। प्रेमचंद जी ने आज तक मेरी कोई लघुकथा लाइक नहीं की है। ना ही वे मेरी मित्र सूची में हैं। इस तरह लोगों को सिर पर चढ़ाना मैं अच्छा नहीं समझती। आप ने मेरी लघुकथायें पसंद की हैं, इसलिए मैं आप से मेरी नई लघुकथा पढ़ने का अनुरोध कर रही हूँ। शेष आपकी मर्ज़ी।
मेरी समझ में नहीं आया कि रोउँ या हँसूँ।
मैंने उनको लिखा- देखिए, कहानीकार तो कोई भी बन जाता है पढ़ पढ़ कर। जैसे मैं बन गया हूँ। पर आप तो स्वयं एक अस्थिचर्ममय लघुकथा हैं।
मुझे लगा था वे भड़क जाएँगी, मेरा तंज़ देख कर। पर नहीं। उनका जवाब था- आपसे अपनी ऐसी प्रशंसा सुनकर बहुत अच्छा लग रहा है। पर यह अस्थिचर्ममय लघुकथा के बारे में तो कभी किसी वरिष्ठ कथाकार ने आज तक कोई चर्चा ही नहीं की। आप ही बताइए ना।
मुझे साँप सूंघ गया।
( यह एक सच्चा वाकया है, मैंने केवल निर्मल वर्मा की जगह प्रेमचंद का नाम बदला है)

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फालतू चंदगी की अमर कहानी
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उन दिनों हर गाँव में कई चंदगी होते थे। इसलिए ज़रूरी था कि हर चंदगी की अपनी अनन्य पहचान हो, मसलन, दांतला चंदगी, काबा चंदगी इत्यादि। काबा, तोतला नहीं, उसका समीपवर्ती होता है। हमारा चंदगी फालतू चंदगी था।
चंदगी मेरे चाचा का सहपाठी था, फिर मेरा हुआ, और स्कूल छोड़ा उस साल मेरे छोटे भाई के साथ पढ़ता था। आठवीं में। मेरे साथ भी आठवीं में ही था। आठवीं उन दिनों शिक्षा की राह में एक बड़े पहाड़ की तरह थी।
क्लास में कोई भी प्रश्न पूछा जाए तो चंदगी, मुस्कुराता हुआ, हाथ मलते हुए खड़ा हो जाता था। हाथ मलने का कोई मनोवैज्ञानिक कारण नहीं था। डंडे खाने के लिए गर्म करता था। ठंडे हाथ में तेज़ झन्नाटा होता है। मैं चंदगी की मुस्कुराहट को सही पैमाइश करते हुए उसे हँसी कहता, पर अर्थभेद की आशंका से हिचक रहा हूँ। बहरहाल, हम उसे चंदगी-मुस्कान कह सकते हैं। मुँह खुला हुआ, आँखों में एक अर्थमुक्त खुशी झलकती हुई, जिसका विस्तार हमेशा कानों तक होता था।
यह नहीं कि चंदगी ने कभी किसी प्रश्न का उत्तर नहीं दिया था। दिया था। आख़िरी बार तब, जब मास्टर छाजू राम ने पूछा था। " चलो तुम बताओ, जब दुशासन द्रौपदी का चीर हरण कर रहा था, तो इतना बड़ा योद्धा साड़ी खींचते हुए थक कर चूर हो गया, मगर विफल रहा, क्यों?"
चंदगी उठा, " मेरे को लगता है मास्टर जी वह जितनी खींचता था, वह फटाफट उतनी ही वापस बाँध लेती थी।"
"सुनी इस बेवकूफ़ की बात! ऐसा कभी हो सकता है?"
" क्यों नहीं मास्टर जी, अगली दिन में पाँच बार खोलती बाँधती हो तो हाथ फटाफट चलेंगे। क्यों नहीं?" चंदगी ने उंड़ेल दिया।
अगर आप सोच रहे हैं कि चंदगी का जवाब धृष्टतापूर्ण था तो आप बिल्कुल मास्टर छाजू राम की तरह सोच रहे हैं। कहीं दूर तक भी चंदगी के जहन में यह नहीं था कि द्रौपदी के पाँच पति थे।
सब चट्‍टे एक बार मास्टर जी का चेहरा देख रहे थे, तो एक बार चंदगी का।
मास्टर छाजू राम ने अनायास निकल गयी हँसी को होठों से फुर्र की आवाज़ करते हुए उड़ा दिया। यह क्रोध का समय था। वे जानते थे, शिक्षा व्यवस्था पर कई सालों से बोझ बने इस बदतमीज़ लड़के ने मेरी अनुशासन प्रिय अध्यापक की छवि पर घातक प्रहार किया है।
उन्होनें चंदगी को आगे आने के लिए कहा। हमें लग गया था, आगे का मुकाबला मंच पर होगा।
मास्टर छाजू राम और चंदगी का वह कौशल प्रदर्शन एक इनडोर खेल प्रतियोगिता से कम नहीं था। मास्टर जी को आज हाथ को छोड़ कर चंदगी की देह को सुतियाना था और चंदगी को जैसे हर वार को हाथ पर रोकना था। पचासों डंडे बरसा कर भी मास्टर छाजू राम सफल नहीं हुए। हांफते हुए चिल्लाये, " अपना बस्ता उठा, और बाहर निकल जा। दोबारा स्कूल की तरफ मुँह भी नहीं करना।"
चंदगी ने जाते हुए जब सब की ओर देखा तो, थोड़ी देर के लिए चली गयी चंदगी-मुस्कान वापस चेहरे पर लौट आई थी।
आधे घंटे में ताऊ सुंडा राम, बस्ते समेत चंदगी को पकड़ कर वापस स्कूल ले आये। हाथ जोड़ कर दृढ़ता से बोले, " देखो मास्टर जी आप एक बार नहीं, हर बार फेल करो, कोई बात नहीं। दो नहीं, दस डंडे मारो, कोई बात नहीं। पर स्कूल से नहीं निकालोगे। बस एक बार सगाई हो जाए, हम खुद ही निकाल लेंगे। कौन से लड्डू बँट रहे है, स्कूल में। ब्याह सगाई में अड़चन डालना ठीक नहीं है।"
जब उल्टी सीधी बात करने का आरोप सामने आया तो ताऊ सुंडा राम ने भी दो लगाने का फ़र्ज़ अदा किया. " बोलना ज़रूरी है नालायक ! चुपचाप बैठ कर नहीं सुन सकता।"
लिहाजा चंदगी ने टाट के अंतिम कोने पर खाली हुई जगह को फिर भर दिया।
इसके बाद चंदगी राम ने क्लास में केवल चंदगी-मुस्कान का उपयोग किया।
सगाई तो होनी ही थी, इकलौता बेटा, उस पर तीन किल्ले ज़मीन। आख़िर, चंदगी एक दिन स्कूल और शिक्षा की राह से हट गया।
उसके बाद जिस किसी ने भी पूछा, "और भई चंदगी, क्या कमा रहे हो आजकल?"
चंदगी का एक ही जवाब था, " मैं क्या कमाऊँगा भाई, फालतू आदमी हूँ।"
चंदगी ने स्वयं के फालतू होने का इतना प्रचार किया कि 'फालतू चंदगी' हो गया।
मैं जब भी गाँव जाता तो चंदगी एक ही बात पूछता, " यार हम तो बाट देख रहे हैं तेरे अफ़सर बनने की।"
आख़िर उसकी यह बाट भी पूरी हो गयी। जब पता चला कि मैं कस्टम अफ़सर बन गया हूँ तो ढूँढता हुआ आया। आते की बांथ भर ली, बोला " आज तो अपना भाई क्या, ऐसा लग रहा है चंदगी ही अफ़सर बन गया।" ऐसे में जाहिर है मेरे मन में ख्याल आया होगा कि चंदगी को मेरे से कुछ तो उम्मीद है। आया था, एक बार नहीं कई बार। बल्कि मुंबई में रहते हुए कई बार सोचा भी, चंदगी के लिए कुछ तो करना चाहिए। शिक्षा मनुष्य को मात्र पश्चाताप करके, बिना किसी के लिए कुछ किए, ग्लानि को मन से पोंछना सीखा देती है। मुझे शिक्षा मिली थी।
जब भी गाँव आया तो चंदगी एक ही बात कहता, " बस सीहोर गाँव का नाम और ऊँचा करना भाई।"
मुझे लगता कुछ तो माँगेगा। पर नहीं, उसे बीड़ी के सिवाय किसी चीज़ की दरकार नहीं थी। बीड़ी मैं पीता नहीं था।
सालों बाद पिछली बार गाँव गया तो ऐसे ही चाचा जी से पूछ लिया, " चंदगी का क्या हाल है?"
मेरी तरफ बिना देखे ही बोले, " कौनसा? फालतू चंदगी? मर गया फालतू में ही।"
मेरा सिर झटके से उठा। मैंने चाचा जी की तरफ अविश्वास से देखा।
" खेलते हुए एक बच्चा गिर गया था नहर में। आव देखा ना ताव, कूद गया। उस बालक को तो किनारे धकेल दिया, पर खुद बह गया। तीन मील दूर पंप हाउस पर लाश मिली। खुद के बच्चों का अभी ब्याह सगाई भी नहीं हुआ है।"
चाचा जी ने तो खबर सुना दी। पर मैं सुनते ही काठ हो गया।
मेरे कानों में चंदगी की आवाज़ गूँज रही थी- 'आज तो अपना भाई क्या, ऐसा लग रहा है चंदगी ही अफ़सर बन गया।'
जब वह बच्चा डूब रहा होगा तो सब पुकार रहे होंगे ' रे कोई बालक गिर गया नहर में!' चंदगी का मन पुकारा होगा- ' किसी का भी हो, मेरा ही बच्चा डूब रहा है।' कूद पड़ा होगा।
महान लोगों के बुत बनाए जाते हैं। मगर बुत एक दिन टूट जाते हैं। चंदगी की जीवनी एक कहानी है। कहानी अमर होती है।

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गिर गया चाँद

गिर गया चाँद
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रधिया ने भी वैसे प्यार ही किया था। प्यार के पोखर में भी दलदल होती है यह तब समझ आया जब पेट से हुई और जगिया को बताया। थप्पड़ सा जवाब मिला, " चल बे रंडी कहीं की!"
यह तो मीनाताई ने दुनिया देखी थी जो रंडी शब्द का सही अर्थ समझाने की बजाय उसे रास्ता दिखा दिया। लड़की पैदा हुई तो मीनाताई ने मनकी नाम दिया। लड़की कहाँ मनकी होती है, पर ताई बोली, " भैंस को कटडा और धंधेवाली को लड़का, हुए सो नहीं हुए। बस यह समझ लो कि ऐसे मुहल्ले में लड़की को अकेला छोड़ने का मतलब है १०० का नोट सड़क पर रख देना। आँख झपकी के गया।"
इधर चाँद निकलता उधर रधिया मनकी को मीनाताई के पास छोड़ काम पर निकल जाती।
अंधेरी रात का मतलब यह नहीं होता कि चाँद निकलता ही नहीं है। बल्कि अपना बड़ा सा मुँह दिखा के चला जाता है।
मनकी ने उस दिन देखा तो पूछ लिया, " अम्मी चाँद पीछे की तरफ से कैसा होता है?"
"काला ही होगा तभी तो कभी भी पीठ नहीं दिखाता है।"
जब 'काम' से वापस लौटते मनकी को अपनी खोली में लेकर आ रही थी तो चाँद गायब था।
मनकी से नहीं रहा गया, " अरे अम्मी, चाँद इतना जल्दी कहाँ गया?"
"छिप गया।"
मनकी अम्मी की नादानी पर हँस कर बोली, "क्या अम्मी, ज़रा देखो ऊपर, कहीं है छिपने की जगह। नीचे गिर गया होगा।"

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मूँछों वाली औरत

मूँछों वाली औरत
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इब्राहिम देमिर के चेहरे की इबारत पुरानी किताब की तरह बड़ी और स्पष्ट थी। मैं देखते ही पहचान गया, इब्राहिम ही है।
" इब्राहिम, हबीबी...इतने साल बाद!" मेरी गर्मजोशी का ठिकाना नहीं था।
उसकी मुस्कान झुरियों में छुप गयी थी, या शायद थी ही नहीं। उसने मेरे कंधे पर हाथ रख कर धीरे से कहा," महमत!" और आगे निकल गया। मुझे लगा उसने मुझे नज़रअंदाज़ नहीं किया, अस्वीकार करने की रसीद दी है।
मैं जुएलरी के धंधे में नया नया आया था। धक्के खा रहा था। तब इब्राहिम ने मेरे कंधे पर हाथ रखा था। वह प्यार और सहारे का हाथ था। पता नहीं क्या पसंद आ गया था उस खड़ूस आदमी को मेरा। शायद स्थापित मान्यताओं में मेरी अनास्था। या औरत के समर्थन में समाज के खिलाफ मेरा मुखर विद्रोह।
बार बार कहता," तुम सबसे अलग हो महमत, मैं तुम्हें अपनी बेटी एल्मा से मिलाता हूँ एक दिन।" वह जिस तरह कहता मुझे लगता या मेरी खामख़याली थी कि वह मुझ में अपना दामाद देख रहा है।
आख़िर एक दिन उसने मुझे अपनी वॅन में बिठा ही लिया। " आज हमारे साथ डिन्नर करके जाओ।"
वॅन में वही तस्वीर लगी थी, जो उसके ऑफिस के भीतर की दीवार पर थी। जिसे मैं फ्रीदा कोएलो समझ रहा था। यह फ्रीदा नहीं थी। पर वही खूबसूरती, आँखों में वही ग़मगीनी, और वही मूँछें।
मुझे घूरते देख इब्राहिम बोला," मेरी पत्नी है, दीलारा। खूबसूरत ही नहीं थी, दुनिया में सबसे अलग थी। एक मूँछ वाली औरत के साथ शादी करने के लिए मुझे ज़मीन आसमान एक करना पड़ा। दीलारा ने साफ कह दिया था, " चाहे कुछ भी हो जाए, अपनी पैनी और खूबसूरत मूँछ नहीं निकालूंगी। यह दुनिया आदमी के बाप की नहीं है, मेरी माँ की है।"
इब्राहिम गुज़रे वक़्त में चला गया। "मैं जानता हूँ दीलारा की खूबसूरती से ज़्यादा, उसका स्वाभिमान और उसकी मूँछे अंकारा के कट्टरपंथी गुण्डों को चुभ रही थी। पाँच बदमाशों ने अकेला पाकर उसे घेर लिया। मरने से पहले दो की साँस बंद कर गयी। पर बस में नहीं आई। मरती नहीं तो मैं जानता हूँ, क़ानून उसे फाँसी की सज़ा देता। मेरा खून खौल उठा। बाकी तीनो को मैंने चुन चुन कर मारा, और पकड़ा जाऊं उससे पहले अपनी बेटी को लेकर यहाँ भाग आया।" इब्राहिम ने कम शब्दों में अपनी लंबी कहानी निपटाई।
मैं इस इन्क़लाबी सोच पर फिदा हो गया था।
हम इब्राहिम के घर पर बैठ गपशप करते रहे। खाने की टेबल तैयार हो रही थी।
इतने में एक खूबसूरत, लंबी तगड़ी लड़की, पेंट और जॅकेट पहने अंदर आई। आँखें इब्राहिम जैसी, शरारत भरी, बाकी चेहरा दीलारा सा। बहुत खूबसूरत, नज़र टिकाना संभव नहीं था। पैनी, हल्की, तरतीब से कटी मूँछो में, एक पुरकशिश औरत, महज अपनी निगाह से आदमी की सांस बंद कर सकती है।
"एल्मा, मेरी बेटी।....यह महमत है एल्मा। बहुत अच्छा लड़का है, सबसे अलग। एल्मा अपनी माँ की तरह है महमत। यह दुनिया, कहती है, किसी के बाप की नहीं, मेरी माँ की है।"
मुझे अचानक लगा मैं बहुत छोटा हूँ, एल्मा के सामने। मैंने एल्मा के लिए तुरंत खुद को रिजेक्ट कर दिया।
उसके बाद मैं इब्राहिम से कभी नहीं मिला। एल्मा को कभी नहीं भूला। पर साथ ही यह भी याद रहा कि फ्रीदा कोएलो हो, दीलारा हो या एल्मा, मूँछों वाली औरत आदमी के बूते से बाहर होती हैं।
उनकी हल्की खूबसूरत मूँछों के आगे आदमी अपने आपको हीन पाता है।

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ज़िन्दा होने की कोशिश
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उसे किसी के साथ की भी ज़रूरत नहीं है, प्यार को तो रहने ही दीजिए। यही लगता था, गोंडवाना क्लब के जहाज़ी रेस्तरां की चार जन की टेबल पर रोज़ाना उसे अकेले बैठे देख कर। प्यार का ज़िक्र इसलिए कि कुछ चेहरे ही एंटीलव होते हैं; बस एकदम वही लगता था वह।
मैं हफ्ते में दो तीन बार जाता था, किसी भी दिन। दिन के हिसाब से पीने ना पीने वालों का मैं भौंह चढ़ा कर अभिनन्दन करता हूँ। वह मुझे हमेशा वहीँ बैठे मिला। उसके बिना उस टेबल का खाका मेरे दिमाग में तो आज भी नहीं बन सकता है। कुछ दिनों बाद हमारी नज़रें मिलने लगी, और उसके कुछ दिनों बाद एक हल्की सी अभिवादन की मुस्कान का लेनदेन होने लगा। मैं भी कोई खुले दरवाज़े वाला मकान नहीं हूँ। वैसे भी ख़ाली पड़े रेस्तरां में किसी अनजान के सामने जा बैठने वाली शख्सियत अलग ही होती है। वह भी मेरी तरह सूरज ढलने का ऐलान जल्दी ही कर देता था। उसकी अपनी वजह होगी, मुझे घनी रात घर लौटने का मतलब पीकर पीने की मुनादी करने सा लगता है। उस दिन शायद कोई किट्टी पार्टी थी, औरतों से भरे रेस्तरां से तो यही लग रहा था। सिर्फ उसकी टेबल पर जगह थी।
बैठते हुए मैंने कहा- " आप यहाँ रोज़ आते हैं।" मेरे लहजे में आधा सवाल था, और आधी सूचना।
" यस, आई एम इन लव। मैं इतना प्यार में डूबा हूँ कि मुझे यह वक़्त अपने लिए चाहिए ही होता है।"
मुझे कोफ़्त हुई। एक तो ज़िन्दगी में इतना गलत आकलन शायद ही मैंने किसी चेहरे का किया होगा। और दूसरे किसी के सजाए हुए एकान्त में यूँ ही घुस आने के लिए। " सॉरी, आज का यह व्यवधान मेरे सिर होगा। उम्मीद है आप सहन कर लेंगे।"
मेरे नाप तौल कर पेश किये वक्तव्य से वह प्रभावित नहीं हुआ। हाथ से बैठने का ईशारा किया। जैसे पूजा में बैठा आदमी करता है।
दो घूँट बियर के बाद मैं आगे बढ़ने को तैयार था।
" प्यार आपको भी मयख़ाने तक ले आया?"
" नहीं, कोई भी एक ऐसी जगह चाहिये थी, जहाँ मैं दो घण्टे उस वक़्त के लिए गुजारूं,जो मैंने उसके साथ गुज़ारा था। दो घंटे अकेले चाय या काफी नहीं पी सकता, बस इसलिए यहाँ आता हूँ।'
बहुत ही हिफाज़त से बंद किये दरवाज़े को बिना खड़खड़ाहट के धीरे धीरे खोलने में मैं कामयाब हुआ। उस दिन के बाद हम साथ बैठकर पीने लगे। अपनी अपनी बियर, अपना अपना बिल; बातें ऐसी, जैसे मुझे उसके बारे में सब कुछ जानना था, और उसे मेरे बारे में कुछ भी नहीं। मुझे लगता था मेरे जाने के बाद वह ऐसे ठहर जाता होगा जैसे तैरने वाले के जाने के बाद एक निर्जन तालाब का पानी।
एक दूसरे का नाम जानने में ही दो तीन दिन चले गये।
" पीपी... प्रेमप्रकाश! वह मुझे पीपी कहती थी तो अब मैं खुद को पीपी से ही जानता हूँ।"
" मैं रणजीत...लोग मुझे रंजीत कहते हैं, तो रंजीत ही सही।" मेरी अनुस्वार-क्रीड़ा को समझ कर भी उसने अनसुना कर दिया।
"अब भी तुम उसे उतना ही प्यार करते हो?"
" अब भी?..दूर की कौड़ी फेंक रहे हो। गलत अंदाज़े से। मैं अब ही उसे प्यार करता हूँ। जब हम साथ थे, कोई दो साल, तो मैं उसे प्यार नहीं करता था, मैं जानता हूँ।"
यह एक गैर-मामूली से प्यार का अफसाना था, जिसने मेरी तजस्सुस की लौ को तेज़ कर दिया।
पीपी भिवानी से नागपुर आया था। एक ऐसे प्यार की गिरफ्त से भाग कर जो उसके लिए कुछ दिन तो जन्नत की सेज था, और बाद में एक पिंजरा लगने लगा।
आईडी को वह एक एजुकेशन सेमिनार में मिला था। आईडी का पूरा नाम उसने मुझे कभी नहीं बताया। मैं आज भी इन इनिशिअल्स को तरह तरह से फैला कर अनुमान लगाता हूँ। आईडी उम्र में उस से बड़ी थी। सेमीनार में आँखें ऐसी मिली कि वहीँ पर दो परिंदे पूरे झुण्ड से अलग होकर चहचहाने लगे। लौट कर भिवानी आये तो रोज़ शाम की चाय आईडी के घर पर होने लगी। तकल्लुफ चला गया। डिनर साथ और फिर सब कुछ साथ। एक जोड़ा बन गया। कइयों का मानना था, शादी कर ली है। पर नहीं, कभी बात भी नहीं की दोनों ने शादी के बारे में। आईडी को एक अच्छा आदमी चाहिये था, और पीपी बाकायदा एक अच्छा आदमी था। पीपी को जैसे अच्छा होने का भरपूर ईनाम मिल गया था। आईडी उसकी ऐसे देखभाल करती थी, जैसे वह कोई फरिश्ता है। खाली बैठते ही कहती- "इधर आओ, सिर में थोड़ी मालिश कर दूँ।"
साथ रहते हुए कभी किसी चीज़ के लिए उसने पीपी को पैसे नहीं खर्च करने दिए। पीपी को लगा वह आईडी का ही नहीं जिंदगी का भी लाडला है। पर बस कुछ महीने। जन्नत में भी बोरियत होगी, अगर जन्नत है तो। सैक्स भी रूटीन होकर उबाऊ हो जाता है। पीपी की मंज़िल कहीं आगे है, उसे ख्याल आया। वह ज़िन्दगी की इस गर्म मुलायम रज़ाई से बाहर निकल कर फरार होने के सपने देखने लगा। उसे महसूस हुआ वह कभी आईडी से प्यार करता ही नहीं था। वह निस्वार्थ से दिख रहे इस समर्पण के जाल में फंस गया है। यह प्यार की नहीं, ऐश की गिरफ्त है।
वह एक दिन वहाँ से भाग निकला। इस्तीफ़ा भी दूर आकर भेजा। और अपने ज़िन्दगी का मक़सद हासिल करने में जुट गया। नए लोगों से मिला, नई औरतों से भी। एक दो से ताल्लुक भी बने। पर एक दिन लगा, दुनिया में दूसरी आईडी नहीं है। सबके अपने कुछ मतलब हैं, जो दो दिन में दिख जाते हैं। आईडी उसे निस्वार्थ प्रेम की प्रतिमा लगने लगी। अपराध-बोध, पश्चाताप, और प्रायश्चित, अर्थात् फिर प्यार। और वह आईडी का होकर रह गया। सात सौ मील दूर जाकर।
" मैं किसी दूसरी औरत के बारे में सोच भी नहीं सकता। और ना ही आईडी के पास जाकर उसके जीवन में कोई दखल देना चाहता हूँ। मैं बस इसी लायक हूँ कि दूर रह कर उसे प्यार करता रहूँ।"
तरह तरह के तर्क देकर मैं उसे रोज़ समझाने लगा कि उसे एक बार आईडी से ज़रूर मिलना चाहिये।
" जो बीच में छोड़ आये उसे पूरा करो पीपी। उससे मिलो एक बार जाकर। जानो तो सही। दस साल हो गए, तुम अब लौट कर नहीं जा सकते। ज़िन्दगी आगे निकल गई है। पर पता तो करो। हो सकता है, उसे तुम्हारी मदद की ज़रूरत हो। उसके लिए कुछ करके तुम अपनी ज़िन्दगी का बोझ हल्का कर सको।"
दोस्त तो नहीं कह सकता, पर हम एक दूसरे को समझने लगे थे। मैंने आखिर पीपी को भिवानी जाकर आईडी से मिलने के लिए तैयार कर दिया।
"लगे तो एक आध दिन रुक जाना। देखो, कैसे मिलती है वह तुम्हें।"
एक दिन छोड़कर मैं गोंडवाना गया। मन तो नहीं था, उदासी तारी थी। सोचा वक़्त कट जायेगा। मुझे भी पीपी की आदत सी लग गई थी। वह भी नहीं होगा। पर चला गया।
मैं रेस्तरां पहुँचा तो पीपी के सामने दो बियर बोतल ख़ाली रखी थी। चहक रहा था। वेटर्स के साथ ऊंची आवाज़ में हँस हँस कर बातें कर रहा था। मुझे देखते ही खड़ा होकर कस कर गले से लगा लिया। यह तो एक अलग प्रेमप्रकाश था।
मैंने धीरे से कहा- " क्या हुआ भिवानी नहीं गया?"
उसने ठहाका मारा।
" गया कैसे नहीं। गया, मिलकर आया हूँ। आई मैट हर, रंजीत। बैठ बताता हूँ।"
उसने बोतल में बची हुई बियर एक झटके में ख़त्म की।
मुझे देख कर वह बहुत खुश हुई। वैसे की वैसी है। उस जेंटलमैन के पैरों में वेसिलीन लगा रही थी। मुझे देखते ही उठ कर गले से लगा लिया। मेरा परिचय कराया। '' यही है पीपी, जिसके बारे में मैं तुम्हें बताती रहती हूँ। कोई छः महीने मेरे साथ रहा, इसी घर में। और फिर एक दिन बिना बताये बेवकूफ गायब हो गया।"
मुझे लगा, मैं बीमार हूँ और वह मेरी बीमारी के लक्षण सबको दिखाने के लिए एक एक करके मेरे कपड़े उतार रही है।
मुझे पास बिठाया, और धीरे से कहा- " मैं तुम्हें देख कर आज बहुत खुश हूँ पीपी। मुझे तो लगा था, तुम मर गए हो।"
बहुत ज़िद की उसने, आज आज रुक जाओ। पर मैं आधी चाय पीकर वापस चल दिया।
उसने ऊंची आवाज़ देकर एक और बियर बोतल का आर्डर दिया।
मैंने कहा- " तुम डिप्रेशन में हो पीपी, इसलिए पिये जा रहे हो।"
वह फिर ज़ोर से हँसा। " हो सकता है। पर आत्महत्या नहीं करूँगा। क्योंकि मैं पहले ही मर चुका हूँ.... ज़िन्दा होने की कोशिश जरूर करूँगा।"
उसने मेरी ओर देखा। " तुम्हें देर तक बैठने की आदत नहीं है। तुम जाओ।" और हाथ हिला कर मुझे अलविदा कह दिया।

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बाबू गौतम

ला मादरे वेस्टिदा
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वह मेरा पेइंग गेस्ट था। किराए वाले रूम की एंट्री अलग से थी, इसलिए मैंने हमेशा अकेले मर्दों को किरायेदार रखा। कोई झंझट नहीं रहता। आदमी अपने काम पर गया तो गया, पीछे से बाई कमरा झाड़ पोंछ देती थी। सुबह का नाश्ता और चाय मेरे यहाँ से मिलेगा, खाना अपना बाहर खाओ। मुझ से बस नमस्ते जी का रिश्ता रखो। हाँ, ज़रूरत पड़े तो कुछ भी ले लो, पर जान बूझकर ज़रूरत पैदा मत करो। पढ़े लिखे मर्द अपनी सीमा रेखा जल्दी ही समझ जाते हैं।
हरियाणा का था, रोहतक के पास किसी गाँव का रहने वाला। गाँव में माँ थी, बाप था और एक छोटी बहन। बी ए आर सी में नौकरी लगी थी। अच्छा लड़का था। कमरे के कोने में एक ईजल स्टैंड था। घर आकर पेंटिंग करता था। हालाँकि मुझे ताक झाँक की आदत नहीं है। बाई ने बताया था- सीनरी बनाता रहता है।
सब ठीक चल रहा था कि एक दिन पुलिस स्टेशन से फ़ोन आया। इंस्पेक्टर की आवाज़ में अनहोनी का अंदेशा था।
" यह यशवीर राठी को जानती हैं जी आप, इसकी जेब में आप का नंबर मिला है।"
" जी मेरा पेइंग गेस्ट है। क्यों क्या बात है?"
" बात तो क्या है जी, ख़तम हो गया।"
मुझे बस इतना लगा कि मनुष्य का जीवित होना एक सच्चाई नहीं है। सच्चाई है उसके चले जाने के बाद का शून्य।
ऐसा एक्सीडेंट हुआ कि जगह पर ही जान चली गई।उसके पिताजी आये थे, बॉडी ले जाने के लिए। मैंने दुःख जताया तो बस इतना बोले, " मरा नहीं जा सकता जी, मरने वाले के पीछे।अपना शरीर आधा कट जाये, साँस तो तब भी लेनी पड़ती है। एक लड़की है, उसके हाथ अच्छे से पीले करने की उम्मीद बंधी थी। ऊपर वाले को नहीं सुहाया।"
जाते वक़्त कहने लगे, " सामान कुरियर करवा देना। माँ का लाडला था, पेंटिंग का बहुत शौक था उसको, तो उसकी पेंटिंग्स को ज़रा अच्छे से पैक करवा कर भिजवाना। आपके घर का किराया और सामान भिजवाने का जो खर्चा आएगा उसकी पाई पाई चुका दूँगा जी।"
" नहीं, आप फ़िक्र मत करो।" मैं आगे यह नहीं कह पाई कि मेरे बेटे जैसा ही था। बेटे जैसा कहना मुझे खोखला सा लगा। वह औरत जिसकी शादी हुई हो, पर नहीं के बराबर, और जिसने अपनी कोख से बच्चे को जन्म नहीं दिया हो, वह एक माँ बनकर बोले तो खोखला ही लगेगा।
मैंने घर आकर उसका कमरा खोला, और सबसे पहले पेंटिंग्स को संभाल कर एक तरफ रखने का मन बनाया।
ठीक ठाक सी पेंटिंग कर लेता था। पेंटिंग्स में बनाने वाले के मन की झलक तो होती है तो उसका चेहरा याद करते हुए मैं एक एक पेंटिंग को गौर से देख रही थी। मुझे पेंटिंग की बहुत समझ नहीं है। वैसे ऐसा कुछ एब्स्ट्रैक्ट भी नहीं था। रंग और आकार स्वाभाविकता से ज़्यादा उभरे हुए थे, पर आकर्षक थे। देखते देखते जैसे ही एक पेंटिंग को मैंने सीधा किया तो मेरे मुँह से ज़ोर से छी: निकला और मैंने पेंटिंग को हाथ से छोड़ दिया।
नीचे पड़ी पेंटिंग में मैं खुद ही नग्न लेटी थी, मेरी ही आँखों में आँख मिलाये।
"बेवकूफ!"
अगर वह जीवित मेरी आँखों के सामने होता, तो धक्के मार कर बाहर निकाल देती।
यह पेंटिंग नहीं किसी विकृत मन की कुत्सित सी कल्पना लग रही थी मुझे। चेहरा मेरा था, बाकी बस कामुक भावना से किया गया एक अतिरेकी चित्रण। किसी को भी अपनी देह की सही तस्वीर पता नहीं होती है, पर यह कतई मेरा शरीर नहीं था। और वक्ष? देखते ही झुरझुरी सी मेरे मन में हुई। " बेहूदा कहीं का!"
दो भरे भरे उरोज, और उन पर लगभग एक एक इंच के टीट्स। छी:!
मैंने वह पेंटिंग उठाकर एक तरफ रख दी छुपाकर। कुरियर को फोन करके पैसे और पता थमा दिया, वे लोग खुद ही पैकिंग करके ले गए।
कई दिन बाद मैंने वह पेंटिंग फिर निकाली। देखकर लगा कि हर्ष मुरारका, इसकी कला के नहीं तो, कामुकता के दाम तो दे ही देगा। किसी ज़माने में मुझे उसकी म्यूज़ कहते थे लोग। वह जानता है यह मेरी देह नहीं है।
हर्ष ने पेंटिंग को देखते ही एक टेढ़ी हँसी हँसी, जिसका टेढ़ा अर्थ था मैंने तो तुम्हें देखा है रेवा।
" यू रियली पोज्ड फॉर दिस आर्टिस्ट?"
" डोंट बी स्टुपिड हर्ष! और तुम्हें इस बात से क्या लेना देना, और क्या दुनिया को। मुझे बताओ फॉर योर पर्सोनल कलेक्शन, तुम मुझे इसके कितने पैसे दे सकते हो? एक दो लाख!"
हर्ष पूरी संजीदगी से पेंटिंग को देख रहा था।
"और तुम्हें यह आर्टिस्ट लगता है, दुनिया तुम्हें कांनोइज़िर मानती है। लोग कहते हैं- हर्ष मुरारका हैज एन आय फॉर आर्ट। दिस इस ऑलमोस्ट पोर्न, हर्ष।"
उसने पेंटिंग से अपनी नज़र हटाई। " नो रेवा नो। तुम ऑफेंड हो गयी हो इस पेंटिंग को देख कर। दिस इज़ नॉट अबाउट न्यूडिटी। दिस इज़ ए वंडरफुल डेपिक्शन ऑफ़ मदरहुड। देखो, जैसे शिशु ने खूब जी भर कर दूध पिया है। खूब लबड़ा है तो सूज गए हैं टीट्स। दिस पेंटिंग विल मेक वेव्स। एंड सी, प्रेगनेंसी के स्ट्रेच मार्क्स, इतनी खूबसूरती से किसी आर्टिस्ट ने नहीं बनाए होंगे आज तक। जैसे लौटती लहरें रेत पर छोड़ जाती हैं अपनी छाप।"
" तो तुम इसे ऑक्शन में उतार दोगे।"
" यस रेवा, एंड इट विल मेक यू रिचर बाय एट लीस्ट ए मिलियन। दस लाख का चेक तो मैं आज दे सकता हूँ तुम्हें।"
यशवीर के पिता के चेहरे की खुश्क ईमानदारी मेरी आँखों मैं तैरने लगी।
चेक बुक लेकर जब मैं रोहतक के पास कलानौर गाँव पहुंची तो मेरे मन में अजीब सी उथल पुथल थी।
घर में सन्नाटा था। मुझे देखते ही यशवीर के पिता सकपका गए। " अरे बहन जी, आप! बस यह ब्याह सिर पर आ गया। आपके पैसे जल्दी ही लौटा दूंगा।"
मैं देर तक चुपचाप खड़ी रही। फिर पास डली एक खाट पर बैठ गयी। मुझे इनका नाम याद था, दिलबाग सिंह। मैंने दस लाख का चेक बनाया, और उनके हाथ में थमा दिया। "मैं यहाँ आपसे पैसे लेने नहीं पैसे देने आई हूँ।"
आधा मुँह ढके, लाल घाघरे, सफ़ेद कमीज, पीली ओढ़नी में एक भरे बदन की औरत, गेंहूँ साफ़ करते हुए, हमारी बातें सुन रही थी, और बीच बीच में हमारी तरफ देख रही थी।
" दस लाख! ये किस बात के?" दिलबाग सिंह हैरत से बोले।
" किसी बात के नहीं, यह एक पेंटिंग की कीमत है, जो आपके बेटे ने बनाई थी, और मैंने रख ली थी।"
" ऐसी कैसी पेंटिंग बनाई मेरे बेटे ने!" औरत से अब रहा नहीं गया।
मैं कुछ देर तक निरूत्तर खड़ी रही। आखिर मेरे मुँह से निकल गया। "आप की पेंटिंग बनाई थी उसने, अपनी माँ की।"
मुम्बई लौटी तो हर्ष का फ़ोन आया।
" मेरी बात सुनने से पहले अपना दिल थाम लो रेवा। तुम्हारी वह पेन्टिंग मेड्रिड के प्राडो म्यूजियम में फ्रांसिस्को दे गोया की मशहूर पेन्टिंग ला माजा देस्नुदा, यानी न्यूड माजा, के साथ टांगी जायेगी। और इसका नाम होगा ला मादरे देस्नुदा, द न्यूड मदर। उस पेंटिंग की माजा भी दर्शक की आँखों में देख रही है, बिलकुल तुम्हारी तरह।कहो, अब भी तुम्हें शक है तुम्हारे किसी वक़्त के प्रेमी की नज़र पर।"
मुझे लगा मैं एक विशाल मंच पर निर्वस्त्र खड़ी हूँ, और दुनिया आँखें उठाये मुझे देख रही है। मुझे, जो मैं नहीं हूँ। माँ।
"कोई पचास हज़ार डॉलर और आ रहे हैं, तुम्हारे पर्स में। दिस पेंटर हैज इम्मोर्टालाईज़ड यू रेवा। क्या नाम है इसका, यशवीर! राईट? अरे कुछ तो बोलो स्वीट हार्ट।"

"थैंक यू हर्ष।" मैं कहीं और थी। मैं तस्वीर बन कर अपने पेंटर को देख रही थी। मुझमें रंग भरते हुए।
" हाँ, और सुनो, यू नो समथिंग अबाउट ला माजा देस्नुदा? शायद नहीं! तो सुनो, दे गोया ने इसकी पेंडेंट पेंटिंग भी बनाई थी, पेंडेंट पेटिंग माने सेम पेंटिंग का दूसरा रूप, और वह थी, ला माजा वेस्टिदा, मतलब द क्लोथेड माजा।"
मैं ट्रांस की अवस्था में थी।
" तुम सुन रही हो मुझे, या बेहोश हो गयी हो।"
"यस टैल मी हर्ष।"
"तुम्हारे इस पेंटर को कहो कि वह इस की पेंडेंट पेटिंग बनाये और इस निर्वस्त्र माँ को कपड़े पहनाये।"
मैंने धीरे से कहा, " यह मुमकिन नहीं है, हर्ष। वह मर चुका है।"
" ओह माय गॉड! दिस इज़ सैड रेवा।"
कुछ देर की चुप्पी के बाद उसने कहा, " कोई बात नहीं, इसे डिजिटल्ली भी ड्रेस-अप किया जा सकता है। बोलो, क्या पहनाया जाये तुम्हें?"
मैंने निश्चित अंदाज़ में कहा, " लाल घाघरा, सफ़ेद कमीज़, और पीली ओढ़नी।"
"व्हाट! मज़ाक मत करो रेवा। बी सीरियस।"
" आय ऍम सीरियस हर्ष। मैं तुम्हें फोटो भेजती हूँ, उस वास्तविक माँ का, ला मादरे वेस्टिदा का।"

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कहानी

कहानी- अनन्त आकाश


मेरे देखते ही बना था ये घोंसला, मेरे आँगन में आम के पेड पर- चिड़िया कितनी खुश रहती थी और चिड़ा तो हर वक्त जैसे उस पर जां-निसार हुआ जाता था। कितना प्यार था दोनो मे! जब भी वो इकट्ठे बैठते, मैं उन को गौर से देखती और उनकी चीं-चीं से बात, उनके जज़्बात समझने की कोशिश करती।

"चीं-चीं-चीं---अजी सुनते हो? खुश हो क्या?"
"चीं-चीं-चीं---बहुत ख़ुश। देखो रानी अब हमारा गुलशन महकेगा, जब हमारे नन्हें-नन्हें बच्चे चहचहायेंगे।" चिड़ा चिड़िया की चोंच से चोंच मिला कर कहता।
"चीं-चीं-चीं- तब हमारे घर बहारें ही बहारें होंगी।" चिड़िया उल्लास से भर जाती।
दोनों प्यार में चहचहाते दूर गगन में इकट्ठे दाना चुगने के लिये उड़ जाते। फिर शाम गये अपने घोंसले में लौट आते। मैं सुबह उठ कर जब बाहर आती हूँ दोनों उड़ने के लिये तैयार होते हैं। उनको पता होता है कि मैं उन्हें दाना डालूँगी, शायद इसी इन्तज़ार मे बैठे रहते हों। इसके बाद मैं कामकाज मे व्यस्त रहती और शाम को जब चाय पी रही होती तो लौट आते।

बरसों पहले कुछ ऐसा ही था हमारा घर और हम। 37 वर्ष पहले शादी हुई, फिर साल भर बाद ही भरा-पूरा परिवार छोड़ कर हम शहर में आ बसे। इस शहर में इनकी नौकरी थी। घर सजा-बना लिया। दो लोगों का काम ही कितना होता है। ये सुबह ड्यूटी पर चले जाते, मैं सारा दिन घर में अकेली उदास परेशान हो जाती। 3-4 महीने बाद मुझे भी एक स्कूल में नौकरी मिल गयी। फिर तो जैसे पलों को पँख लग गये - समय का पता ही नहीं चलता। सुबह जाते हुए मुझे स्कूल छोड़ देते और लँच टाईम में ले आते। बाकी समय घर के कामकाज में निकल जाता। रोज़ कहीं न कहीं घूमने, कभी फिल्म देखने तो कभी बाज़ार तो कभी किसी मित्र के घर चल जाते- चिड़े चिड़ी की तरह बेपरवाह!!
अतीत के पन्नो में खोई कब सो गयी, पता ही नहीं चला।

सुबह उठी तो देखा कि चिड़िया दाना चुगने नहीं गयी। चिड़ा भी आसपास ही फुदक रहा था। पास से ही कभी कोई दाना उठाकर लाता और उस की चोंच में डाल देता। कुछ सोच कर मैं अन्दर गयी और काफी सारा बाजरा पेड़ के पास डाल दिया। ताकि उन्हें दाना चुगने दूर न जाना पड़े। उसके बाद मैं स्कूल चली गयी। जब आयी तो देखा चिड़िया अकेली वहीं घोंसले के अन्दर बैठी थी। मुझे चिन्ता हुई कि कहीं दोनों में कुछ अनबन तो नहीं हो गयी? तभी चिड़ा आ गया और जब दोनों ने चोंच से चोंच मिलायी तो मुझे सुकून हुआ। देखा कि चिड़ा घोंसले के अन्दर जाने की कोशिश करता तो चिडिया उसे घुसने नहीं देती मगर वो फिर भी चिडिया के सामने बैठा कभी-कभी उसे कुछ खिलाता रहता। मैं उन दोनो की परेशानी समझ गयी। चिड़िया अपने अण्डों को से रही थी। दोनो अण्डों को ले कर चिन्तित थे। माँ का ये रूप पशु-पक्षिओं मे भी इतना ममतामयी होता है, देखकर मन भर आया।

कुछ दिन ऐसे ही निकल गए। मैं रोज़ बाजरा आदि छत पर डाल देती। एक दोने में पानी रख दिया था ताकि उन्हें दूर न जाना पड़े। उस दिन, रात जल्दी नींद नहीं आयी। सुबह समय पर आँख नहीं खुली, वैसे भी छुट्टी थी। चिड़ियों का चहचहाना सुनकर बाहर निकली तो देखा धूप निकल आयी थी। पेड़ पर नज़र गयी तो वहाँ चिड़िया के घोंसले में छोटे-छोटे बच्चे धीमे से चीं-चीं कर रहे थे। चिड़िया अन्दर ही उनके पास थी। चिड़ा बाहर डाल पर बैठकर चिल्ला रहा था, जैसे सब को बता रहा हो और आसपास पक्षिओं को न्यौता दे रहा हो कि उसके घर बच्चे हुए हैं। मैं झट से अन्दर गयी और घर में पड़े हुए लड्डू उठा लाई। उनका चूरा कर छत पर डाल दिया। इधर-उधर से पक्षी आते, अपना-अपना राग सुनाते, लड्डु खाते और चीं-चीं करते उड़ जाते। आज आँगन में कितनी रौनक थी।

ऐसी ही रौनक अपने घर में भी थी, जब हमारा बड़ा बेटा हुआ था। मेरी नौकरी के कारण मेरे सासू जी भी यहीं आ गये थे। स्कूल से आते ही बस व्यस्त हो जाती। हम उसे पाकर फूले नहीं समा रहे थे। अभी से कई सपने उसके लिये देखने लगे थे। इसके बाद दूसरा बेटा और फिर एक बेटी हुई। तीन बच्चे पालने में कितने कष्ट उठाने पड़े, ये सोचकर ही अब आँखें भर आतीं। कभी कोई बच्चा बीमार तो कभी कोई प्रॉब्लम। जब कभी सासू जी गाँव चली जातीं तो कभी छुट्टियाँ ले कर तो कभी किसी काम वाले के जिम्मे छोड़कर इन्हें जाना पड़ता। अभी बेटी 6 माह की हुई थी कि सासू जी भी चल बसीं। बच्चों की खातिर मुझे नौकरी छोड़नी पड़ी। उस दिन मुझे बहुत दुख हुआ था। मेरी बचपन से ही इच्छा थी कि मैं स्वावलम्बी बनूँगी मगर हर इच्छा कहाँ पूरी होती है! इनका कहना था कि आदमी अपने परिवार के लिये इतने कष्ट उठाता है। अगर अच्छी देखभाल के बिना बच्चे ही बिगड़ गये तो नौकरी का क्या फायदा। मुझे भी इनकी इस बात में दम लगा। मगर बच्चे कहाँ समझते हैं माँ बाप की कुर्बानियाँ! उन्हें लगता है कि ये माँ-बाप का फ़र्ज़ है बस। मैं नौकरों के भरोसे बच्चों को छोड़ना नहीं चाहती थी। हम जो आज़ाद पँछी की तरह हर वक्त उड़ान पर रहते, अब बच्चों के कारण घर के होकर रह गये थे।

बच्चे स्कूल जाने लगे। छोटी बेटी भी जब पाँचवीं मे हो गयी तो लगा कि अब समय है। बच्चे स्कूल चले जाते हैं और मैं नौकरी कर सकती हूँ। वैसे भी तीन बच्चों की पढाई एक तन्ख्वाह में क्या बनता है। भगवान की दया से एक अच्छी नौकरानी भी मिल गयी। मैंने भागदौड़ कर एक नौकरी ढूँढ ली। पता था कि मुश्किलें आयेंगी। घर, परिवार और नौकरी। बहुत मुश्किल काम है। मगर मैंने साहस नहीं छोड़ा। बच्चों को अगर उच्च शिक्षा देनी है तो पैसा तो चाहिये ही था।

बच्चे पढ़ लिख गये। बड़ा सॉफ्टवेर इंजिनियर बना और अमेरिका चला गया। दूसरा भी स्टडी विज़ा पर आस्ट्रेलिया चला गया। बेटी की शादी कर दी। हम दोनों बच्चों के विदेश जाने के हक़ में नहीं थे मगर ये विदेशी आँधी ऐसी चली है कि बच्चे पीछे मुड़कर देखते ही नहीं। जिसे देखो विदेश जाने की फिराक में है। बच्चे एक पल भी नहीं सोचते कि बूढे माँ-बाप कैसे अकेले रहेंगे! कौन उनकी देखभाल करेगा! कितना खुश रहते हम बच्चों को देख कर। घर में चहल-पहल रहती। कितना भी थकी होती मगर बच्चों के खान-पान में कभी कमी नहीं रहने देती। ख़ुद हम दोनों चाहे अपना मन मार लें मगर बच्चों को उनके पसंद की चीज़ ज़रूर ले कर देनी होती थी। छोटे को विदेश भेजने पर इनको जो रिटायरमेन्ट के पैसे मिले थे, लग गए। बेटी की शादी कर दी। घर बनाया तो लोन लेकर। अब उसकी किश्त कटती थी। ले दे कर बहुत मुश्किल से साधारण रोटी ही नसीब हो रही थी।

मगर बच्चों को इस बात की कोई चिन्ता नहीं थी। बच्चों के जाने से मन दुखी था। मुझे ये भी चिन्ता रहती कि वहाँ पता नहीं खाना भी अच्छा मिलता है या नहीं। कभी दुख-सुख में कौन है उनका वहाँ दिल भी लगता होगा कि नहीं। जब तक उनका फोन नहीं आता मुझे चैन नहीं पड़ता। हफ्ते में दो-तीन बार फोन कर लेते।

बड़े बेटे के जाने पर ये उससे नाराज़ थे। हमारी अक्सर इस बात पर बहस हो जाती। इनका मानना था कि बच्चे जब हमारा नहीं सोचते तो हम क्यों उनकी चिन्ता करें। जिन माँ-बाप ने तन-मन-धन लगाकर बच्चों को इस मुकाम पर पहुँचाया है, उनके लिये भी तो बच्चों का कुछ फर्ज़ बनता है। वैसे भी बच्चों को अपनी काबिलियत का लाभ अपने देश को देना चाहिये। मगर मेरा मानना था कि हमें बच्चों के पैरों की बेड़ियाँ नहीं बनना चाहिये। बड़ा बेटा कहता कि आप यहाँ आ जाओ। मगर ये नहीं माने। हम लोग वहाँ के माहौल में नहीं एडजस्ट कर सकते।

बड़े बेटे ने वहाँ एक लडकी पसंद कर ली और हमें कहा कि मैं इसी से शादी करूँगा। आप लोग कुछ दिन के लिये ही सही यहाँ आ जाओ। मगर ये नहीं माने। उसे कह दिया कि जैसे तुम्हारी मर्जी हो कर लो। दोनों पिता-पुत्र के बीच मेरी हालत खराब थी। किसे क्या कहूँ!! दोनो ही शायद अपनी अपनी जगह सही थे। उस दिन हमारी जमकर बहस हुई।
"मैं कहती हूँ कि हमें जाना चाहिये। अब ज़माना हमारे वाला नहीं रहा। बच्चे क्यों हाथ से जाएँ?"
"वैसे भी कौन-सा अपने हाथ में है। अगर होते तो लड़की पसंद करने से पहले कम से कम हमें पूछते तो? बस कह दिया कि मैंने इसी से शादी करनी है। आप आ जाओ। ये क्या बात हुई!!"
"देखो अब समय की नज़ाकत को समझो। जब हम अपने आपको नही बदल सकते, वहाँ एडजस्ट नही कर सकते तो बच्चों से क्या आपेक्षा कर सकते हैं। फिर हमने अपनी तरह से जी लिया, उन्हें उनकी मर्ज़ी से जीने दो। फिर हम भी तो माँ-बाप को छोड़कर इस शहर मे आये ही थे!"
"पर अपने देश में तो थे। जब मर्जी हर एक के दुख-सुख में आ जा सकते थे। वहाँ न मर्जी से कहीं आ जा सकते हैं न ही वहाँ कोई अपना है।"

कई बार मुझे इनकी बातों मे दम लगता। हम बुज़ुर्गों का मन अपने घर के सिवा कहाँ लगता है? 'जो सुख छजू दे चौबारे, वो न बल्ख न बुखारे'। मैं फिर उदास हो जाती। बात वहीं खत्म हो जाती।
एक दिन इन्होंने बेटे से कह दिया कि हम लोग नहीं आ सकेंगे। तुम्हें जैसे अच्छा लगता है कर लो, हमे कोई एतराज़ नहीं। मैं जानती थी कि ये बात इन्होंने दुखी मन से कही है।
बेटे ने वहीं शादी कर ली और हमें कहा कि आपको एक बार तो यहाँ आना ही पड़ेगा। इन्होंने कहा कि मेरी तबीयत ठीक नहीं, वहाँ तुम मेडिकल का खर्च भी नहीं उठा पाओगे। आयेंगे जब तबीयत ठीक होगी। बेटा चुप रह गया। मगर मैं उदास रहती। एक माँ का दिल बच्चों के बिना कहाँ मानता है? छोटे को अभी दो तीन वर्ष और लगने थे पढाई में। उसका भी क्या भरोसा कि वो भी यहाँ वापिस आये या न।

एक साल और इसी तरह निकल गया। बेटे के बेटा हुआ। उसका फोन आया तो मारे खुशी के मेरे आँसू निकल गये। उसने कहा कि माँ हमें ज़रूरत है आपकी। आप कुछ दिन के लिये आ जाओ।
इन्हें ख़ुशख़बरी सुनाई मगर इनके चेहरे पर खुशी की एक किरण भी दिखाई नहीं दी।

"देखिये बहु भी अभी बच्ची ही है वो अकेली कैसे बच्चे को सम्भालेगी? इस समय उन्हें हमारी ज़रूरत है, हमें जाना चाहिये।" मैंने डरते हुए इनसे कहा। मगर वही बात हुई। इनको गुस्सा आ गया-
"हाँ आज उन्हें हमारी ज़रूरत है तो हम जाएँ मगर बहन की शादी पर हमें भी तो उसकी ज़रूरत थी तब क्यों नहीं आया था।"
"तब उसे गये समय ही कितना हुया था। हो सकता है कि उसके पास तब इतने पैसे ही न हों फिर उसने कहा भी था कि इतनी जल्दी मैं नहीं आ सकता। आप शादी की तारीख छ: आठ माह आगे कर लें, मजबूरी थी उसकी।" मैंने बेटे का पक्ष लेने की कोशिश की।
"देखो, मैं तुम्हें नहीं रोकता। तुम्हें जाना है तो जाओ मगर मैं अभी नहीं जा सकता। तुम देख रही हो मैं बीमार हूँ। बी पी कितना बढ रहा है। फिर वहाँ कुछ हो गया तो उनके लिये मुसीबत हो जायेगी। मुझे फिर कभी कहना भी नहीं। मैंने मन को पक्का कर लिया है। उनके बिना भी जी लूँगा। वो वहीं मौज करें।"

गुस्सा इनका भी सही था। मगर माँ का दिल अपनी जगह सही था। माँ भी किस तरह कई बार बाप और बच्चों के बीच किसको चुने वाली स्थिती में आ जाती है।
पति की बात जितनी सही लगती है, बच्चों की नादानी उतनी ही छुपाने की कोशिश में ख़ुद पिस जाती है। भारतीय नारी के लिये पति के उसूल बच्चों की मोह ममता पर भारी पड़ जाते हैं। मैं भी मन मसोस कर रह गयी। समझ गयी कि अब बेटा हाथ से गया। अगर अब हम चले जाते तो भविष्य मे आशा बची रहती कि वो कभी लौट आयेगा। अब शायद वो भी नाराज़ हो जाये।

मन आजकल उदास रहने लगा था। जब से रिटायर हुई हूँ तब से तो बहुत अकेली-सी पड़ गयी हूँ। पहले तो स्कूल में फिर भी दिल लगा रहता था। चार लोगों में उठना, बैठना, दुख-सुख बँट जाते थे। अब घर में अकेलापन सालता रहता है। बच्चों की याद आती है छुपकर रो लेती हूँ। मगर ये जबसे रिटायर हुए हैं, इन्होंने एक नियम-सा बना लिया है- सुबह उठकर सैर को जाना, नहा धोकर पूजा पाठ करना, फिर नाश्ता कर के किसी ग़रीब बस्ती की ओर निकल जाना। वहाँ ग़रीब बच्चों को इक्ट्ठा कर के पढ़ाना और सब की तकलीफें सुनना, अगर किसी के काम आ सके तो आना। दोपहर को आराम करना फिर शाम को सैर, पूजा पाठ, ख़बरें सुनना, खाना खाकर टहलना और सो जाना। मगर मैं कुछ आलसी-सी हो गयी थी। मैं अभी अकेलेपन की ज़िन्दगी और बच्चों के मोह से अपने आपको एडजस्ट नहीं कर पा रही थी।

"क्या बात है, आज नाश्ता-पानी मिलेगा कि नहीं।" इनकी आवाज़ सुन कर मैं वर्तमान मे लौटी। पक्षी अभी भी चहचहा रहे थे। नाश्ता बनाकर इनके सामने रखा और खुद भी वहीं बैठ गयी।
"अपना नाश्ता नहीं लाई क्या आज, नाश्ता नहीं करना है?"
"कर लूँगी, अभी भूख नहीं।"
ये कुछ देर सोचते रहे फिर बोले-
"राधा, तुम सारा दिन घर में अकेली रहती हो- मेरे साथ चला करो। तुम्हारा समय भी पास हो जायेगा और लोक सेवा भी।"
"सोचूँगी। अपने बच्चों के लिये तो कुछ कर नहीं पाई, बेचारों को मेरी ज़रूरत थी। आखिर में कन्धे पर तो वो ही उठाकर ले जायेंगे।" मन का आक्रोश फूटने को था।
"मुझे किसी से उमीद नहीं। जो देखना है ज़िन्दा रहते ही देख लिया, मर कर कौन देखता है। बाक़ी कन्धे की बात तो जब मर ही गये तो कोई भी उठाये नहीं उठायेंगे तो जब पड़ौसियों को दुर्गन्ध आयेगी तो अपने आप उठायेंगे। मैं इन बातों में विश्वास नहीं करता।"

मेरी आँखें बरसने लगीं और मैं उठ कर अन्दर चली गयी। ये नाश्ता कर के अपने काम पर चले गये।
रात को जब खाना खाने बैठे तो बोले-
"राधा ऐसा करो तुम बेटे के पास हो आओ। मैं टिकट बुक करवा देता हूँ। तुम्हारा मन बहल जायेगा। मगर मैं नहीं जाऊँगा।"
"अकेली? मैं आपके बिना क्यों जाऊँ? नहीं नहीं।"
"मैं मन से कह रहा हूँ। गुस्सा नही हूँ। बस मेरा मोह टूट चुका है और तुम अभी मोह त्याग नहीं पा रही हो। जानता हूँ वहाँ विदेशी बहु के पास भी अधिक दिन टिक नहीं पाओगी। इसलिये नहीं चाहता था कि तुम जाओ।"
"सोचूँगी।" कह कर मैं काम में लग गयी।
रात भर सोचती रही। इनकी बातें भी सही थीं। फिर क्या करूँ यही सोचते-सोचते नींद आ गयी। कुछ दिन इसी तरह निकल गये। मगर कुछ भी निर्णय नहीं ले पाई। कई बार इन्होंने पूछा भी मगर चुप रही।

उस दिन ये सुबह काम पर चले गये और मैं चाय का कप लेकर बरामदे में बैठ गयी। चिड़िया के बच्चे अब उड़ने लगे थे मगर दूर तक नहीं जाते। चिड़िया उनके पास रहती और चिड़ा अकेला दाना चुगने जाता था। कितना ख़ुश है ये परिवार फिर अपना ही क्यों बिखर गया। सोचते हुए आँख भर आयी। रात को ये खाना खा रहे थे-
"देखो राधा मैं मन से कह रहा हूँ तुम चली जाओ। मेरी चिन्ता मत करो। मैं कोई न कोई इन्तजाम कर लूँगा। न हुआ तो कुछ दिन की बात है मैं ढाबे में खा लूँगा। आज सोच कर मुझे बता देना कल टिकट बुक करवा दूँगा।"
मैं फिर कुछ न बोली। रात भर सोचती रही। सोच में चिड़िया का घोंसला आ जाता। चिड़िया कैसे घोंसले के पास बैठी रहती- देखते-देखते बच्चे फुदकने लगे हैं। चिड़िया उन्हें चोंच मारना, खाना और उडना सिखाती। धीरे-धीरे जब वो पँख फैलाते तो चिड़िया खुश होती। हम भी ऐसे ही उनको बढते-पढते देखकर खुश होते थे। अब मुझे लगता कि चिड़िया की खुशी मे एक पीड़ा भी थी। अब उड़ने लगे हैं। हमें छोड़कर चले जायेंगे।

आज वही पीड़ा सामने आ रही थी। आज मैंने देखा, चिड़ा चिड़िया और बच्चे इकट्ठे बैठे हुए हैं। चोंच से चोंच मिलाकर बात कर रहे हैं।
"चीं-चीं-चीं" चिड़िया चिड़े की आवाज़ में उदासी थी।
"चीं-चीं-चीं" मगर बच्चों की आवाज़ में जोश था और उसी जोश से वो उड़ गये दूर गगन में।

"चीं-चीं-चीं-- बच्चों हम इन्तजार करेंगे, लौट आना।" चिड़िया की आवाज़ रुँध गयी थी। दोनों उदास, सारा दिन कुछ नहीं खाया। मौसम बदल गया था। प्रवासी पक्षियों का आना भी सतलुज के किनारे होने लगा था। गोविन्द सागर झील के किनारों पर रौनक बढ गयी थी।
थोड़ी देर बाद चिड़ा चिड़िया की चोंच से चोंच मिला कर 'चीं-चीं-चीं' कर रहा था।
"चीं-चीं-चीं-- रानी ऐसा कब तक चलेगा? बच्चे कब तक हमसे चिपके रहते? आखिर हम भी तो ऐसे ही उड़ आये थे। उनका अपना संसार है। उन्हें भी हमारी तरह अपना घर बसाना है। जो सबके साथ होता है, वही अपने साथ हुआ है। चलो सतलुज के किनारे चलते हैं। दूर-दूर से हमारे भाई बहिन आये हैं। उनका दुख सुख सुनते हैं।" चिड़े ने प्यार से चिड़िया के परों को चोंच से सहलाया और दोनों सागर किनारे उड़ गये।

हाँ, ठीक ही बात है। सारा देश अपना है। लोग अपने हैं। बस सोचकर उन्हें प्यार से अपनाने की बात है।
मेरे भी आँसू निकल गये थे। पोंछकर सोचा कि यही संसार का नियम है तो फिर क्यों इतना मोह? आखिर कब तक बच्चे हमारे पल्लू से बन्धे रहेंगे। आजकल नौकरियाँ भी ऐसी हैं कहाँ-कहाँ उनके साथ भागते फिरेंगे? चिड़े-चिड़िया ने जीवन का सच सिखा दिया था। मुझे भी रिटायरमेन्ट के बाद जीने का रास्ता मिल गया था।

सुबह जब नाश्ता कर के बस्ती में जाने के लिये तैयार हुए तो मैं बोल पड़ी-
"मुझे भी अपने साथ ले चलें।"
"क्या सच?" इन्हें सहज ही विश्वास नहीं हुआ। इनकी खुशी का ठिकाना नहीं था। इनकी आँखों में संतोष की झलक देखकर ख़ुशी-सी हुई। बच्चों के मोह में हम दोनों के बीच एक दूरी-सी आ गयी थी। आज उस दूरी को पाट कर हम दोनों एक हो गये थे। मैं भी चिड़िया की तरह उड़ी जा रही थी इनके साथ अनन्त आकाश की ओर।


- निर्मला कपिला


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लगा मेरे बाएँ पैर की अंगुलियों पर ज़ोर से हथौड़ा मारा है किसी ने। मेरी चीख निकल गयी। मन में चल रहा स्वप्निल दृश्य झटके से टूट गया। कोई आदमी होता तो सीधा धक्का मारता। एक अधेड़ औरत ने अपने बोरी में लिपटा पत्थर धम्म से मेरे पैर पर रख दिया था। नारनौल अड्डे पर मैं बस से उतर रहा था, वह चढ़ रही थी। पीड़ा थोड़ी शालीनता तो सब की हर लेती है।
"अंधी हो, देख नहीं सकती?" मैं चिल्लाया।
" तुम्हारी तो दोनों सलामत हैं ना! बचा कर रखो अपना पैर।" उसने और भी ज़ोर से जवाब दिया। मैं समझा था, अफ़सोस जताएगी।
" एक मन भर का भाठा ले कर बस में चढ़ती हो, पैर तोड़ दिया, और ऊपर से ऐंठ दिखाती हो।"
वह आधी मुड़ी, " देख अपना रास्ता पकड़, दोबारा भाठा बोला ना तो घर जाने लायक नहीं बचेगा।"
पीछे से कोई बोला, " चल चाचा आगे निकल, घर जा कर सेक कर लेना।" एक रेला आया और मुझे साथ ले गया। मैं बिलबिलाता, लंगड़ाता, चाय की दुकान पर आ टिका। पैर को बर्फ लगाई। दर्द कम हुआ, गया नहीं।
सोचा वापस घर चला जाता हूँ। स्मृतियों की मरीचिकाओं का पीछा नहीं किया जाता। कुछ होता है केवल मन के लिए, जीवन के लिए नहीं। अप्रत्याशित चोट एक चेतावनी होती है। मुंबई से रेवाड़ी, रेवाड़ी से बिमला की ससुराल- निज़ामपुर; एक बार मरने से पहले बिमला को देखने की चाह।
इतने में नज़र गयी, तो उसी औरत को लोग सहारा देकर उठा रहे थे। थक कर बेहोश हो गयी थी शायद। मैंने मुँह फेर लिया। कहीं लोग मेरे सिर नहीं पड़ जाएँ।
निज़ामपुर से पता चला कि गाँव गयी है, अमरपुरा। अमरपुरा की गलियों में मैं आज भी देखता हूँ, खुद को, भागते हुए, निक्कर और बनियान पहने। वहीं मिले थे मैं और बिमला। एक दूसरे का कुछ छीन कर अलग हो गये थे।
पिताजी की बदली हो गयी थी। हमने सामान बाँध लिया था। वह गुस्से में भनभनाती आई थी। " एक बार नहीं दस बार जाओ !" इतना कह कर मेरी राधाकिशन की पत्थर की मूर्ति लेकर भाग गयी थी।
आख़िरी दो टाँके के लिए सिलाई अधूरी क्या छोड़ना! अमरपुरा की बस पकड़ी।
कौन होगा अमरपुरा में? एक दो नाम और कुछ चेहरे, बाकी बस हवा के पर्दे पर बहते दृश्य।
क्या कहूँगा बिमला को? बचकानी हरकत है, इस तरह बेवजह चले आना। पर बड़ी बचकानी हरकत।
भाई रमेश के यहाँ गया। कुएँ पर घर है, तो सोचा मजमा नहीं लगेगा।
बात को हाँक कर बिमला का ज़िक्र निकाला। "चलो आया हूँ तो देख लेता हूँ एक बार!"
" किसको? बिमला को? सुबह देखा मैंने बस में चढ़ते हुए। हर साल आती है। दहमी हंज़ापुर के मेले पर। मन भर की पत्थर की मूर्ति हर साल सिर पर उठा कर ले जाती है। किसी को हाथ लगाने नहीं देती।"
मै लंगड़ा कर उठा। "अब मैं चलूँगा, भाई।"
" यह पैर को क्या हो गया?"
मैं वहाँ नहीं था। मैं चालीस साल दूर चला गया था। दहमी हंज़ापुर के मेले में। ढूँढता फिरता, क्‍या खरीदूँ तीन रुपये में?
राधाकिशन की पत्थर की मूर्ति!
हम ही नहीं, मूर्ति भी बड़ी हो जाती है। मन में बैठी मूर्ति।

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कल 90 वर्षीय शादीलाल जी वॉयलेट लाइन मेट्रो में अकेले सफर करते मिले। सीनियर सिटीजन की सीट पर उनके बगल में बैठने के बाद मुझे लगा वो कुछ बेचैन हैं।
बार बार वे मुझसे पूछते ये कौन सा स्टेशन है?
जब मैंने पूछा कि आपको जाना कहाँ है तो वो माथे पर हाथ रख कर बोले-" वही तो मैं भूल गया हूँ"
फिर आप जाएंगे कहाँ?"- मैंने हैरानी से पूछा।
शादी लाल बोले- "एक बड़ा सा स्टेशन है न ?"
मैंने- नई दिल्ली, राजीव चौक, कई नाम लिए, उन्होंने सबको नकार कर कहा-"ये नहीं, एक स्टेशन है न सेंटर में जहाँ गाड़ी बदलते हैं।"
मैंने पूछा-" सेंट्रल सेक्रेटेरिएट ?"
ख़ुशी से चमकते चेहरे से शादीलाल जी बोले-" जी हां, जीहां, थैंक्यू! थैंक्यू !"
मैंने पूछा- "सेन्ट्रल सेक्रेटेरिएट से किधर जाएंगे?"
"वो तो मुझे याद नही, आई एम नाइंटी इयर ओल्ड, कुछ आप बताइए।" पहले की सारी खुशी को अलविदा कह एकबार फिर शादी लाल पुरानी अवस्था में आ गए।
मैंने धैर्य से पूछा-" आप पहले गए हैं? कितनी देर लगती है?"
शादीलाल-" बस तुरंत आ जाता है।"
मैं ने कहा-" पटेल चौक?"
शादीलाल जी का चेहरा हज़ार वाट के बल्ब सा चमका,
-"बिल्कुल बिल्कुल, अब याद आ गया, पटेल चौक ही जाना है मुझे।"
मैंने एक स्लिप पर पटेल चौक लिख कर उनको दिया और कहा-"सेंट्रल सेक्रेटेरिएट आने वाला है, मेट्रो से बाहर निकल कर किसी को ये स्लिप दिखाइयेगा, वो सही मेट्रो में आपको बैठा देगा।"
शादी लाल जी ने दुआओं की बरसात करते हुए जब मेरा हाथ पकड़ कर दबाया, तो पता नही क्या हुआ, मैं उनके साथ साथ येलो लाइन मेट्रो तक न केवल चला आया बल्कि उसमे सवार हो उनको पटेल चौक तक छोड़ने भी चला गया।
"सम्हाल कर उतरिये, यही पटेल चौक है।" मैंने मेट्रो के दरवाजे पर रुकते हुए कहा।
शादीलाल जी उतरे, पर आगे बढ़ने की बजाय वापस मुड़ कर मेट्रो का दरवाज़ा बन्द होने और ट्रेन चलने तक मेरी ओर देखते हुए यूँ हाँथ हिलाते रहे मानो वे ही मुझे ट्रेन में बैठाने आये हों।

शादीलाल जी की समस्या समझने, निदान सोचने, एक मित्रों से दूसरी में जाने और उनका अगला स्टेशन आने की पूरी प्रक्रिया ताबड़तोड़ 5 मिनट में ऐसी गतिमान हुई कि कई जिज्ञासाएं अनुत्तरित रहीं जैसे
इस उम्र में अकेले क्यों निकलना पड़ा ?
किससे मिलने की बेताबी में यूँ घर से निकाल पड़े ?
अभी भी बच्चों के साथ रहने का सौभाग्य है या नही?
ईश्वर ने कभी फिर मुलाक़ात कराई तो ज़रूर पूछूँगा ।

( निवेदन: अगर आपके घर के कोई बुज़ुर्ग अकेले यात्रा करते हों तो उनको घर और गन्तव्य का पता, मोबाइल नम्बर लिख कर अवश्य देदें या गले मे टांग दें जिससे ज़रूरत पड़ने पर कोई उनकी सहायता कर सके)

राजेश राज जी की फेसबुक वाल से

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गुंजाइश

गुंजाइश
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ग्रॉसवेनर हाउस का अपना एक राजसिक इतिहास है। ग्रोसवेनर्स फॅमिली यानि ड्यूकस् ऑफ़ वेस्टमिन्स्टर का निवास था कभी। इंग्लॅण्ड के राजे रानियों की कई कहानियों का गवाह है, ग्रॉसवेनर हाउस। वैसे भी पार्क स्ट्रीट के ऊपर से हाइड पार्क का हरा भरा नज़ारा, और कुछ दूर चलते ही बकिंघम पैलेस का स्वर्णिम वैराट्य; मेफेयर के इस होटल में कमरा लेकर आदमी को एक बार तो लगता है, वह ब्रिटिश रॉयलिटी की बगल में बैठा है। कर्ज़न स्ट्रीट का वाशिंगटन बस दो गली की दूरी पर है, पर उसका कामचलाऊपन, ग्रॉसवेनर की राजसिकता से बहुत दूर है। वाशिंगटन में या तो सस्ती फिल्म में लंदन एस्टेब्लिश करने के लिए आये बॉलीवुड के लोग दिखेंगे या इकॉनमी टूरिस्ट। लंदन जाकर भी लगता है, इंडिया ने घेर रखा है। ग्रॉसवेनर का किराया भी तिगुना है। पहली बार मैं वाशिंगटन में नहीं, ग्रॉसवेनर में था। विलासिता या भव्यता एक तरफ, वजह थी मेरी गुंजाइश। आज मैं जानता हूँ गुंजाइश ही वह जमीन है, जिस पर नैतिकता व अनैतिकता के झाड़ उगते हैं।
नरम शफ़्फ़ाफ़ बिस्तर पर लंच के बाद की चोघा मीची कर अपनी पांचों ज्ञानेन्द्रियों पर शाही आबोहवा चढाने के लिए मैं नीचे उतरा था, हमेशा की तरह।
इतने में एक लंबी सुतवां छवि सस्ती मिंक का कोट, काली टाइट पेंट, घुटनों तक के जूते, और काला चश्मा पहने मेरे पीछे से आगे आई। हुकर! हुकर को हुकर की तरह ही ड्रेसअप होना होता है। स्पष्टता के लिए।
"वाना कम बॉय!"
बयालीस साल का बॉय! मैं अवहेलना में मुस्कुरा दिया। यूराल पर्वत के उस पार का पुरुष हमेशा लड़का ही रहता है। बूढ़ा हुआ तो, हे यू ओल्ड ब्वॉय! कुछ भी बन जाय, इंग्लॅण्ड का प्रधान मंत्री या अमेरिका का राष्ट्रपति, ब्वॉय ही रहता है। मतलब जांघिया पहनता है तो लड़का।
अचानक उसकी पतली पतली अँगुलियाँ मेरी जांघों के बीच सरसराहट कर के चली गई। मैं गुदगुदी से बिदक कर पीछे हट गया।
" प्रॉब्लम ब्वाय? योर मेंबर इज़ सिक ओर पर्स इस थिन!"
वह मेरा रास्ता रोक कर खड़ी हो गयी। उस के इस दिलफरेब बाने के नीचे के ताने की एक झलक मिली । ५० के ऊपर होगी, तो फिर ब्वॉय कहना तो बनता है। गिंदो बुआ देखती तो बोलती ' बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम!' चेहरे की झुर्रियां मेकअप को उखाड़ देना चाह रही थी।, नकली बूब्स- नकली ही होंगे काया के अनुपात को देखते- मिंक से बाहर उछलने को उकसे हुए थे। चश्मे के अंदर दो धँसी हुई आँखें। डाइटिंग, ड्रग्स, या भूख! मैं ज़्यादा देर नहीं सोचना चाहता था। मैंने चुना;  भूख!ऐसा नहीं कि मेरी सोच ही ऐसी है। पर इसलिये कि मैं आज भूख सोचना अफ़्फोर्ड कर सकता हूँ। मेरे 'मेंबर' की मिजाजपुर्सी के लिए मैं मीडिया की सीढियाँ रातों रात चढ़ने को उतावली किसी युवती को ड्रिंक्स पर बुला सकता हूँ। और दो पेग के बाद किये मनु प्रकाश के दो फोन एक वानाबी यौवना को ग्रॉसवेनर के सुईट तक ले जाने के लिए काफी हैं। मतलब आज मेरी गुंजाइश है। मैंने  दस पौंड निकाले। उसने झपटते हुए कहा, " मनी इस नथिंग ब्वाय, लाइफ इज़ आल अबाउट फन!"
" नॉट फॉर फन, ईट्स फॉर यू, कीप इट।"
" चैरिटी फॉर माय ड्रिंक!" वह नोट को सिगरेट की तरह थामे, होंठ सिकोड़े खड़ी थी। मैं मुड़ कर चल पड़ा।
बीस साल पहले मेरी दस रुपये की गुंजाइश नहीं थी। अगर होती तो मैं भूख ही सोचता, भूख ही चुनता। सोच को पैदा होने के लिए भी गुंजाइश की ज़मीन चाहिये।
तब मैं सचमुच में लड़का था। लालचंद देबी को ले आया था। जब गाँव का कुआँ पूज लिया, और बाबा भैंया की माटी छाँट दी, तो प्रश्न निष्क्रिय हो जाता है कि ब्याह कर लाया था या एक हज़ार देबी के बाप के हाथ में थमा कर। लिंग अनुपात के हिसाब से  मुर्शिदाबाद  में लड़कियों का स्टॉक बहुत बढ़ गया था। स्टॉक से आपको मुर्गियां याद आ रही होंगी। मुझे भी आ रही हैं।  लालचंद सिर पर छोटी सी संदूक, कंधे पर झोला, और पीछे एक मरियल सी औरत लेकर आने वाला चौथा उम्रपार कुंवारा था। सबको नाम चलाने के लिए औलाद चाहिए, इस सामाजिक सहानुभूति में यह सच भी छुपा है कि- सबको रात को सोने के लिए औरत चाहिए। बात गुंजाइश की है।
लालचंद देबी पर टूट पड़ा होगा, जैसे भूखा साँड पछेती फसल में घुस जाये; इधर मुँह मारा, उधर रौंद डाला। औलाद पैदा करनी थी, और हज़ार रुपये भी वसूलने थे। आखिर एक लड़की पैदा हो गई।
एक दिन परस में बैठ कर कह रहा था,  "तकदीर ही माड़ी है, औलाद हुई, वह भी लड़की!"
लड़की अपने बाप का नहीं किसी और के बाप का वंश चलाती है। लालचंद को नफरत है अपनी लड़की से, मगर फिर भी मदारी के बन्दर की तरह सिर पर बिठाकर दुकानों के आगे से एक चक्कर लगाता है। नफरत है, पर लड़की को घर में पटके रखने की गुंजाइश नहीं है, लालचंद की। नफरत को कंधे पर लादे घूमता है। बच्ची देख कर कोई एक बिस्कुट या दो पतासे ही दे दे।
देबी जब भी मुझे मिलती दोनों हाथ मेरे सिर पर रख कर बहुत आत्मीयता से कहती, " अरे मेरा मनुआ कब आया रे! तेरी माँ बहुत मानती है बेटा मुझे!"
" रे मन्नू! ज़्यादा मुंह मत लगाया कर इसको। कुजात, आई बेटे वाली! जन ले बेटा चाहिए तो।" गिंदो बुआ चिल्लाती।
देबी की निचुड़ी सी देह से ज़्यादा टिरे हुए खरबूजे की गंध आती थी। हर दूसरे दिन लालचंद पीट देता, तो मुझे ढूंढती भागती आती थी।
" देख फिर कसाई बन गया आज!"
मुझ से लिपट सी जाती थी; दुःख के मारे या दुःख की आड़ में। माँ को तरस ज़रूर आता था देबी पर, मगर उसका यह बेटा बेटा करना माँ को बिलकुल अच्छा नहीं लगता था।
उस दिन भी लगता है, लालचंद ने पीट कर घर से निकाल दिया था। मुझे भी ढूंढ कर थक चुकी थी। मैं भी क्या कर सकता था, जाकर लालचंद पर थोड़ा आदर्शवाद झाड़ देता था, जिसे वह कान भी नहीं धरता था।
उस दिन लालचंद भी नहीं दिखा। शायद अपनी बंदरिया को लेकर दुकानों की तरफ निकल गया होगा। देखते ही देबी लपक कर मेरी और आयी। दोनों हाथों से मुझे जकड़ लिया। "कुछ कर रे मनुआ कुछ कर!" उसने मेरी छाती में मुँह धंसा दिया। देबी की गंध सीधे मेरे नथुनों में आ रही थी, मैंने नाक ऊपर कर लिया। उसका हाथ मेरी छाती पर धीरे धीरे चलने लगा। " तेरी माँ मुझे बहुत मानती है रे मनुआ।"
उसकी पतली पतली अँगुलियाँ रेंगती हुई मेरे पाजामे का नाड़ा पार कर गई। टिरे खरबूजे की गंध मेरे भीतर घुस रही थी। मैं असहाय था, मेरी पूरी देह में एक ऐंठन सी भरती जा रही थी।
" कुछ कर रे मनुआ, तेरी माँ मुझे बहुत मानती है।"
धुंधलके का वक़्त था। हम दोनों पोठे से चिपके खड़े थे। किसी की पदचाप सुनाई दी, तो मैंने धकेल कर देबी को अपने से अलग कर दिया। मेरा मन जुगुप्सा से भर गया। मैं अपने शरीर की अकड़न को दबाये वहां से निकल गया। मुझे लगा देबी एक स्लट है। लालचंद के रौंदने से भी इसकी हवस शांत नहीं होती है। पता नहीं क्यों, मैंने भूख के बारे में नहीं सोचा। शायद मेरी गुंजाइश नहीं थी।
कई साल तक मैंने देबी को नहीं देखा। माँ गुज़री तब बैठक के लिए आई थी। और भी सिकुड़ गयी थी। ऐनक चढ़ गई थी। आँसू नहीं थे, उसके शब्दों में ही रुदन था।
" बहुत भूखी थी मैं, उस दिन बेटा। दो दिन हो गए थे रोटी खाये। मार झेल सकता है इंसान, भूख नहीं।"
रुक गयी। मेरे सर पर हाथ रखा। " मुझे लगता था दस रुपये भी आदमी का बच्चा बिना वसूले नहीं देता है। तेरे को बुरा लगा होगा।....तेरी माँ मुझे बहुत मानती थी बेटा।"
मुझे लग रहा था, धरती फटेगी और मैं इसमें समा जाऊँगा। मैंने भूख के बारे में क्यों नहीं सोचा। मन को तस्सली देता हूँ- शायद मेरी गुंजाईश नहीं थी।
पर देबी ने उस दिन जो कुछ किया, आज सोचता हूँ तो कुछ अनैतिक नहीं लगता है। गुंजाईश ने मेरी सोच बदल दी है। आज मैं भूख को जानता हूँ, समझता हूँ।

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टिटिहरी का अभिशाप
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याद आ रहा है।
कई दिनों बाद सब कह रहे थे, टिब्बे तले मत जाना बालको, टिटिहरी ने अंडे दे रक्खे हैं।
टिटिहरी के अंडों के आसपास से कोई गुज़र तक नहीं सकता है। आदमी को आते देख कर टी टी टी टी करके जो चीख़ पुकार मचाती है, कलेजा काँप जाए।
टिटिहरी भी अजीब है। एक तो घोंसला नहीं बनाती है, ज़मीन पर अंडे देती है, और फिर जब तक बच्चे नहीं निकलते, दिन रात उनके बचाव के लिए जी जान एक करती है।
बहुत दिल करता था एक बार टिटिहरी के अंडे देखूं। जब भी माँ से कहा, बहुत डाँटती थी, " भूल कर भी नहीं, आँख फोड़ देगी।"
"पर आँख बचा कर भी देखा जा सकता है ना माँ?"
माँ घूरती थी मुझे। उसे लगता था मैं ज़रूर ऐसा करूँगा एक दिन। जिनके सिर पर बाप नहीं होते वे बच्चे जो दिल में आता है ज़रूर करते हैं, कभी ना कभी।
एक दिन सोते समय मुझे समझाया," देखो, टिटिहरी के अंडे अगर कोई देख ले तो उनमें से कभी भी बच्चे नहीं निकलते।"
मैने कभी टिटिहरी के अंडे नहीं देखे। हालाँकि मुझे हमेशा लगा माँ ने मुझ से झूठ बोला है। शायद एक ऐसा झूठ जो सच से बड़ा होता है।
पर फिर भी मेरी जिज्ञासा बनी रही। टिटिहरी के अंडे देखने की नहीं, यह जानने की कि टिटिहरी को इतना डर क्यों है कि आदमी उसके अंडे फोड़ देगा।
कुछ दिन पहले एक पौराणिक कथा पढ़ने को मिली।
टिटिहरी एक बेघर पंछी है, ऋषियों सी। एक बार ऐसा हुआ कि एक घुमक्कड़ ऋषि ने टिटिहरी के अंडों पर पैर रख दिया, देखा नहीं। ऋषि हमेशा देख कर पैर रखते हैं, टिटिहरी भी मानती थी। पर उस दिन से उसका विश्वास उठ गया। उसे लगा पुरुष कितना भी ज्ञानी हो, उसमें संवेदना की कमी रहती ही है।
टिटिहरी ने अभिशाप दिया, "ए पुरुष, जा, तू हमेशा इस संदेह में जीयेगा कि तेरी संतान अपनी है या अवैध।"
माँ मर चुकी हैं। पिता जी पता नहीं कहाँ हैं, तस्वीर देखी है मैंने। मेरे नयन नक्श, कद काठी, कुछ भी पिताजी से नहीं मिलते हैं।
माँ ने बताया था, " तेरे पिताजी बहुत अच्छे हैं, बस हमारे स्वभाव नहीं मिले, इसलिए हम दोनों अलग हो गये।"

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प्यार- एक नाख़ून जितनी जान
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बहुत भन्गुर होता है प्यार। एक अंगुली की चोट से ढह सकता है।
शिखा जब भी अपनी नाख़ून पर से कटी हुई अंगुली को देखती है, बस यही ख्याल आता है।
सातवीं में थी। तेरह साल की, बस। पास में एक साइन्स टीचर किराए पर आए थे। आंटी और मम्मी बहुत घुल मिल गयी थी। उनका लड़का भी सातवीं में था, वैभव। बातों में एक नंबर नौटंकीबाज, पर पेन्सिल ऐसे पकड़ता था, जैसे अँगुलिया ऐंठी हुई हैं। चीज़ों को ऐसे छूता था, जैसे खा जाएँगी।
टीचर ने मॉडल बनाने को कहा तो, सबसे पहले उछला, " मैं ताज महल बनाऊंगा, टीचर!" खाक ताज महल बनाएगा। मुहल्ला सिर पर उठा लिया। कार्ड बोर्ड, थर्मो कोल, ग्लू, कैंची,और वो पैनी ब्लेड का कटर, जाने क्या क्या इकट्ठा किया। आता नहीं काग़ज़ मोड़ना भी। तीन दिन से रोज़ छत पर लेकर बैठ जाए। एक चीज़ खोले, दूसरी को बंद कर दे। हार कर मम्मी बोली, " अरे बेटा तू ही बनवा दे इसका ये मॉडल। इसने तो बना लिया।"
मैंने ज़्यादा फरवट बनने के चक्कर में अंगुली बचाई नहीं और रेत दिया थर्मो कोल को।
हे भगवान, जो हाय तौबा मची।
अंगुली इधर मेरी कटी, और ये जनाब उछल रहे हैं, जैसे ततैया काट गया। मुझ से ज़्यादा चिल्ला चिल्ला कर रो रहे हैं। मम्मी और आंटी की भी तू तू मैं मैं हो गयी। अंगुली का हो गया कबाड़ा। दो दिन तक तड़पी मैं। पट्टी तो रही कोई १५ दिन। जिस दिन खोला तो,अंगुली की तो भद्द हो गयी। बिना नाख़ून की नंगी अंगुली। देखते ही शर्म आए।
चलो, ज़िंदगी लूले लंगड़ों को तसल्ली दे देती है। मेरी तो थोड़ी सी अंगुली कटी थी।
अब यह जनाब, तो जी ऐसे हो गये जैसे उम्र क़ैद काटनी है। जैसे हत्या का पाप लग गया हो। पूरे दिन स्कूल में बस मेरा ही मेरा ख़याल रखने लगे। साये की तरह मेरे साथ साथ। तरस भी आता था। ऐसा लगता था कि मुझ पर कोई ख़तरा आ गया तो फट से जान देकर प्रायश्चित कर लेंगे।
तीन साल बाद साइन्स टीचर, अपने परिवार के साथ चले गये। जाते जाते वैभव जी ने हमें भी रुलाया, आँखें बचाकर खुद भी रोये।
ज़िंदगी आगे बढ़ गयी।
अंगुली थी वहीं पर। हाथ बढ़ाओ कि दिख जाये। अब सुनाओ जी पूरी कहानी।
थक कर हमने भी कहानी संक्षिप्त कर दी। " स्कूल में एक मॉडल बनाते कट गयी थी।" अब बड़े हो गये तो " एक लड़का था.." से शुरू करके काहे छोटी सी बात को बाली उमर की प्रेम कथा बनाना था। अंगुली के गुनहगार का नाम और चेहरा तक भूल गया था। बस जैसे ही अंगुली को देखते एक धुंधली सी तस्वीर सामने ज़रूर आ जाती।
शादी हुई तो इनको तो पूछना ही था। अब तो इतनी बार दिया जवाब हमें खुद भी सच्चा लगने लगा था। " स्कूल में एक मॉडल बनाते समय कट गयी थी।" इन्होनें भी हमारे हुस्न और मुहब्बत की खूब कद्र की। कटी अंगुली को बड़े नाज़ुक अंदाज़ में पकड़ कर कई बार कहा, " यह अंगुली कट गयी, अच्छा ही हुआ, शायद इसी वजह से तुम्हारा हुस्न नज़र लगने से बचा हुआ है।"
चार साल पहले रेवाडी एक शादी में जाना पड़ा। मंझली बुआ एक महाशय को ले आई, " पहचान!"
मैंने ना में सिर हिलाया ही था कि वे जनाब तो मचल पड़े," दिखाओ अपना हाथ।" और जो सत्य को, साफ मन से ही, अतिशय की चुनरी पहनाई, मेरा तो खाना गले से नहीं उतरा। इनकी आँखे देखो तो एक दम ऐसे हो गयी जैसे मुझे पहचानते ही नहीं हैं।
मैं जानती हूँ मैने झूठ बोला था। पर.. पर क्या कहूँ अब?
आज चार साल हो गये। जब भी मैंने कहा, "मेरी बात तो सुनो!" बस एक ही जवाब मिला, " क्या कहना है अब। बीस साल साथ रहे हैं हम, एक झूठ के साथ। अब भी साथ ही रहेंगे, पर सिर्फ़ बच्चों के लिये।"
कोई बताए मुझे क्या होता है प्यार? दो आत्माओं का पवित्र मिलन?
हुँ! एक कटी हुई अंगुली का धक्का लगे तो ढह जाए। एक नाख़ून जितनी जान होती है प्यार में।

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नायिका -भेद और हंसा भाभी
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अग्नि-पुराण के नायिका भेद के अनुसार मुझे लगता था हंसा भाभी स्वकीया है। देह और आत्मा से स्वकीया। परकीया होने का तो प्रश्न ही नहीं था।
उन दिनों मैं नायिका-भेद का अध्ययन कर रहा था। मैंने बिहारी-रत्नाकर में परकीया के बारे में पढ़ा था। ' देखत कछु कौतिग इतै; देखौं नैक निहारि। कब की इकटक डटि रही, टटिया अंगुरिन फार।
नहीं, हंसा भाभी ने अँगुलियों से टटिया को फाड़ कर तो क्या, कभी सपने में भी कौतुक करते नायक, परपुरुष, को एकटक नहीं देखा होगा।
'उनहीं के सनेहन सानी रहे, उनही के जू नेह दिवानी रहे।'
रसखान की इस व्याख्या के अनुसार वह प्रोषितपतिका अवश्य थी। चन्दन भैया के स्नेह में सनी रही हैं, जब वे थे तब भी, और जब वे नहीं रहे तब भी। प्रोषितपतिका रत्नाकर के अनुसार भी थी। मैं ही तो परस के डाखाने से चिट्ठी लाकर देता था उनकी।
कर लै, चूमि, चढ़ाई सिर, उर लगाई, भुज भेटि।लहि पाती पिय की लखति,बाँचति,धरति समेट।
इतना दिखावा नहीं करती थी, पर उनकी आँखें यही सब कहती थी, चन्दन भैया की चिट्ठी देख कर।
हंसा की कोटड़ी ढह चुकी है अब तो, पर आज भी एक लैंडमार्क सी है। परस में किसी से रास्ता पूछो तो पहला निर्देश होगा- हंसा की कोटड़ी से सीधा जाना है, या फिर दायें या बायें मुड़ना है।सबकी जुबान पर है हंसा की कोटड़ी, पर कोई ही बचा है, जिसे याद हो हंसा। और आजकल वालों में तो जैसे जिज्ञासा ही मर गई है। कोई पूछ तो ले- भई इस ढूँढ हो गयी कोटड़ी को हंसा की कोटड़ी क्यों बोलते हैं। ना, कोई सवाल ही नहीं। दुनिया को कुछ लेना देना ही नहीं। दुनिया मतलब मुकाम पोस्ट सीहोर। दो पाने होते थे तब सीहोर में, धरती के दो गोलार्द्ध से। और बस इतनी ही थी दुनिया।
चन्दन भैया चले गए। सबके के लिए चले गए। आखिर माँ ने भी दिल सख्त करके मान ही लिया। " होता तो आता...अब दुनिया में नहीं है मेरा चन्दन।"
जैसे चन्दन भैया गये, उस तरह से जाने वाले दिखाई देते रहते हैं। दिल्ली रहते थे। एक बार गए तो बस लौटे ही नहीं। कुछ साल तक तो बीच बीच में बात उठती रही- " चन्दन ही था जी, मैं भागा भी पीछे पीछे चन्दन...चन्दन... चिल्लाता। पर आप को तो पता है खारी बावड़ी की भीड़। थोड़ी देर में ओझल हो गया।" अब ऐसी बात माँ के दिल में उम्मीद ज़िन्दा रखेगी ही। पर दिल भी हार कर एक दिन कह देता है- " होता तो आता। अपनी माँ से मिलने तो आता।"
उम्मीद एक बात है, और विश्वास अलग। हंसा भाभी को विश्वास था। चन्दन है, इसी दुनिया में है। वह कहने लगी है - " वे हैं। आते हैं, मुझ से मिलने।" और रोज़ नायिका के अलग अलग रूप धरने लगी। वासकसज्जा हुई। शाम होते ही बिस्तर ठीक करने लगती। गुनगुनाती हुई- " अब वे बस आते ही होंगे..!"
माँ हार कर माथा पीटती बाहर आकर बैठ जाती। कभी जब नहीं आते होंगें चन्दन भैया तो, विरह-उत्कण्ठिता हो जाती। और निर्मला देवी की ठुमरी गुनगुनाती रहती - "लाखों के बोल सहे...सितमगर तेरे लिए।"
मुझे बिठाकर कहती- "लल्ला जी, दुनिया कुछ भी कहे, आप तो विश्वास करते हैं ना, आपके भैया मुझ से मिलने आते हैं। मैं बिना शब्दों के अपनी आँखों से अपना विश्वास जताता।"
सत्य भी विश्वास पर ही तो टिका है।
मैंने सब भेद देखे नायिका के, हंसा भाभी में। उनकी मुस्कराहट में, उनके आँसूओं की धार में।
और वे अंत में अभिसारिका बन गई। सज सँवर कर प्रियतम की राह देखती अभिसारिका।
दुनिया को अब यह चरित्रहीनता का नाटक लगने लगा। दुनिया मतलब सीहोर गाँव। मां को लगा इस उपहास और निन्दा के लिए मैं भी ज़िम्मेदार हूँ। और मुझे साफ़ कह दिया गया- " तुम्हारी अब इस घर की तरफ आने की कोई ज़रूरत नहीं है।"
दुनियावालों की मेरे बारे में राय बनी "अच्छा लड़का था जो इस राँड के चक्कर में पड़ कर बिगड़ गया।" मेरी नायिका मुझ से दूर हो गई।
अभिसारिका का ही एक उपभेद है- वेश्या।
"हंसा तो एकदम वेश्या हो गई।" सुनकर क्या बीती होगी हंसा भाभी पर पता नहीं। मैं विदग्ध था।
दुनियावालों ने कहा इस विक्षिप्त औरत का ईलाज मोडावाली के सिद्ध बाबा ही बता सकते हैं। माँ कुछ भी करने के लिए तैयार थी।
दुनियावालों में से कुछ लोग बाबा के पास गए। बाबा ने समझाया- ' कुछ लोग सचमुच इस दुनिया से नहीं जाते हैं। उन्हें भेजने के लिए अनुष्ठान करना पड़ता है।"
अनुष्ठान के दिन दुनिया इकठ्ठी हो गई। यहीं पर जो यह अब एक खंडहर है- हंसा की कोटड़ी।
थाल में आटा गूंद कर एक कच्चा लौंदा बनाया बाबा ने। यह लौंदा चन्दन भैया थे। एक चाकू मंगवाया गया। और बाबा ने चिल्लाकर कहा- " औरत को लाओ।"
आज दुनियावालों में सबसे पीछे मैं भी खड़ा था। हंसा भाभी ने बाहर आने से मना कर दिया। मगर मना करने से क्या होता है। दुनियावाले हैं ना। उन्हें ज़बरन बाल पकड़ कर बाबा के सामने लाया गया। बाबा ने आग जलाकर धुंआ किया। धुंआ ज़रूरी होता है, अनुष्ठान के लिए। हंसा भाभी चीखती चिल्लाती रही।
बस उसी समय उनकी आँखें मेरी आँखों से मिली। देखती रही मेरी तरफ, जैसे कह रही थी- " तुम तो विश्वास करते हो ना मेरा लल्ला जी।"
मेरी आँखें नम हो गई। मैंने सिर झुका लिया।
जब ऊपर देखा तो बाबा ने खचाक से चाकू मारा और आटे के लौंदे के दो टुकड़े कर दिए।
हंसा भाभी ज़ोर से चिल्लाई और बेहोश हो गई। उस आटे के लौंदे में खून कैसे निकला, मैं कभी नहीं समझ पाया।
हंसा भाभी को कुछ दुनियावालों ने उठाकर अंदर खाट पर डाल दिया। वे फिर कभी नहीं उठी।
यह कौनसा भेद था नायिका का, मैं नहीं जानता।

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छिपकली

छिपकली
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उसे लगा वह बिस्तर से नहीं ऊबड़ खाबड़ ज़मीन से उठ रहा है। सहारा नहीं ले पा रहा है, हाथ बहुत छोटे हो गए हैं। जैसे तैसे फर्श पर पैर टिकाये तो कुछ लधड़ से उसके पीछे गिरा। लंबी, भारी पूँछ। उसकी आँख पूरी तरह खुल गई। जनार्दन वह नहीं है जो कल सोया था। वह एक डायनोसर जैसी बड़ी छिपकली बन गया है। बाहर जानकी के काम करने की आवाज़ आ रही थी। उसने बाथरूम में जाकर चटखनी लगा ली। अपने आपको आईने में देखा। जबड़ा खोला, गर्दन हिलाई। और फिर धीरे से बोल कर देखा। मन में आया था 'जानकी' बोलूं। पर हिम्मत नहीं हुई; 'पानी' बोला। आवाज़ डायनोसर की हा..आ..आ के साथ बाहर निकली।
कई देर तक बाथरूम में खड़ा रहा।
" यह चाय ठंडी हो गई। बाथरूम में ही बैठे रहोगे!"
वह धीरे धीरे चल कर अपनी भारी भरकम पूँछ घसीटता हुआ ड्राइंगरूम में आया।
जानकी ने उसे रोज़ की तरह देख कर अनदेखा कर दिया। जैसे उसका इस तरह छिपकली हो जाना ना तो कोई अचम्भे की बात है, ना डर की। जानकी इतनी सहज थी कि जनार्दन को लगा वह हमेशा से ही छिपकली था, बस पता उसे आज चला है। यह उसके लिए छिपकली हो जाने से भी बड़ा झटका था। वह कुछ देर सुन्न खड़ा रहा।
जब उसका यूँ खड़े रहना उसे बेमानी सा लगा तो वह सोफे पर बैठ गया। इतनी बड़ी पूँछ को समेटने और सोफे पर पीठ टिकाने में मुश्किल हुई, पर जानकी ने पलक उठा कर भी नहीं देखा।
जनार्दन ने सोचा, आज वह दफ्तर नहीं जायेगा। घर से बाहर ही नहीं निकलेगा। मगर कहने से घबरा रहा था। अगर जानकी ने पूछा- " किसलिये नहीं जाओगे दफ्तर? कौनसी नौबत आ गई है?"
अगर उसने कहा- ' देखो तो, मैं कैसे छिपकली बन गया हूँ! देखो मेरी तरफ, मेरा चेहरा, यह इतनी बड़ी पूँछ!"
तो कुछ भी जवाब आ सकता था। " छिपकली बन गये हो तो दफ्तर नहीं जाओगे? अच्छा बहाना है।"
" पहले तुम क्या थे? छिपकली नहीं थे तो?"
या फिर " दिमाग खराब हो गया है तुम्हारा?"
यह सुनकर हँसेगी तो नहीं जानकी? नहीं हँसेगी नहीं। आजकल उसे माहौल को हल्का करना बिलकुल अच्छा नहीं लगता है। हँसेगी नहीं।
" अब सोफे पर ही बैठे रहोगे? पता है क्या टाइम हो गया है।" जानकी के लिए सुबह देर से तैयार होने का मतलब है सभ्यता को तहस नहस कर देना।
जनार्दन बड़ी मशक्कत से तैयार हुआ, अपनी पूँछ को संभालता हुआ। इंसान के कपड़े एक बड़ी सी छिपकली को पहनाना कितना पेचीदा काम है। उसने जैसे तैसे फंसा लिए। मगर पूँछ तो फिर भी बाहर ही लटकती रही। उसने धीरे धीरे दरड़ दरड़ चबा कर अपना नाश्ता किया, और बाहर निकला।
उसे लग रहा था, उसे देखते ही लोग वहीँ की वहीँ ठहर जायेंगे। कोई अचम्भे से मुँह पर हाथ रखेगा, तो कोई चिल्ला पड़ेगा। मगर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। वह बस की लाइन में जाकर खड़ा हो गया। पूँछ संभालने में बहुत दिक्कत हो रही थी। उसे लग रहा था भीड़ उसकी पूँछ पर चढ़ जायेगी। मगर नहीं, किसी ने उसकी पूँछ को छुआ तक नहीं। फिर भी सामान्य होने के लिए इतना काफी नहीं था। वह एक एक शब्द में बात कर रहा था। हा..आ..आ का स्वर निकलते ही वह चुप हो जाता था।
दफ्तर पहुँचा तो सिर हिला कर काम चलाता रहा। मगर किसी के भी चेहरे पर उसे देख कर कोई हैरानगी नहीं थी। किसी मनुष्य का जैसे इस तरह छिपकली हो जाना बहुत ही सामान्य सी बात है।
उसे काम करने में बहुत तकलीफ हो रही थी। छोटे छोटे पंजे जैसे हाथों से लैपटॉप पर काम करना आसान नहीं है। ऊपर से भारी भरकम पूँछ। पर उसने कैसे ना कैसे दिन निकाल दिया।
सोचता रहा। कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी को पता भी नहीं चल रहा है, मैं एक छिपकली बन गया हूँ। या फिर सभी लोग छिपकली या कोई न कोई और जानवर बन गए हैं और अपनी अपनी मुश्किल में फंसे हैं। कोई शुतरमुर्ग है, तो कोई हायना या फिर कोई गीदड़ है, तो कोई लोमड़ी। सोचते हुए राहत मिली।
हो सकता है, सब अपने बारे में जानते हैं, और दूसरे सब एक दूसरे को आदमी ही लग रहे हैं। कुछ तो हुआ है कल रात। या काफी समय से हो रहा है। मेरा नंबर हो सकता है, कल रात आया है।
अगर ऐसा है तो जानकी क्या बन गई होगी? हायना या मेरी तरह छिपकली ही?
सोचता हुआ वह घर पहुंचा। अब वह खुद के बारे में इतना परेशान नहीं था, बल्कि जानकी की हर हरकत को गौर से देख रहा था। वह उसे हर तरह से औरत ही दिख रही थी। ऐसे में यह पूछना कि 'जानकी तुम क्या हो? हायना या छिपकली या कुछ और?' कितना बेहूदापन होगा। बिना बात झगड़ा हो जायेगा।
उसने रात होने का इंतज़ार किया। वह देर रात तक पलंग के एक कोने पर पड़ा रहा। अपनी पूँछ को संभालता हुआ। जब जानकी ने कई देर तक करवट नहीं ली तो उसने धीरे से अपनी पूँछ उसकी पीठ पर रख दी। जानकी हिली, और करवट बदल कर मुँह उसकी तरफ कर लिया। जनार्दन ने अपना लंबोतरा सा चेहरा उसकी छातियों के बीच धँसा दिया। उसकी पूँछ नाचने लगी। दोनों लिपट कर गुत्थमुत्थ हो गए। डायनोसर की हा.. आ..आ.. हा.. आ.. आ की आवाज़ आती रही। जानकी ने कोईं आवाज़ नहीं की। ना डायनोसर की, ना हायना की। वे दोनों अलग हो गए। जनार्दन ने अपने मन को समझा लिया कि शायद जानकी भी उसकी तरह एक डायनोसर जैसी छिपकली ही है। उसे अब अपने छिपकली होने का ना कोई दुःख है और ना हैरानी।

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दूसरा वरदान

दूसरा वरदान
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उच्चत है, पर कहाँ है, बहुत कम लोग जानते थे। अंदाज़ा सबको था। सीहोर, सेहलंग और बाघोत के बीच जो त्रिभुज सी बनती है, उसके बीच में ऊंचे बालू के टीलों पर एक छोटी सी बस्ती। इस ऊँचाई से ही लगता है उच्चत नाम मिला था। कोई रास्ता उच्चत नहीं जाता था। रास्ता बनाते हुए उच्चत जाना पड़ता था। कोई जाये भी क्यों उच्चत, जब वहां किसी को कोई काम ही नहीं पड़ता था। कोई पच्चीसेक घर होंगे। उच्चत के लोग मरे हुए जानवरों की खाल उतार कर कूर्म और नरी की जूतियाँ बनाते थे। गाँव गाँव जाकर खुद ही बेच आते थे, तो कोई उच्चत किस लिए जाये। वैसे चूची बच्चे की ज़ुबान पर था उच्चत, एक व्यक्तिवाचक नहीं, भाववाचक संज्ञा की तरह।
उच्चत बहुत से भाव अभिव्यक्त करता था। कटाक्ष तो समझो उच्चत का पर्याय था। कोई बेवकूफी की बात करे, तो उच्चत से पढ़ कर आया है। जो चीज़ दिल्ली नहीं मिली तो फिर उच्चत में ही मिल सकती है, और कहीं नहीं।
बस दोवरी माता थी, जिसकी वजह से उच्चत दुनिया की सबसे अलग जगह थी। एक ऐसी माता जिसके यहाँ कोई नहीं जाता था। टीलों के बीच तीन काली सिल्लियों को रख कर बनी थी दोवरी माता। तीन सिल्लियों से माता का मंदिरघटा निवास कैसे बनेगा, हर बच्चे को भी पता है। तीन सिल्लियों को जंचाकर एक ही ज्यामितीय आकृति बनती है। दोवरी माता इसलिए कि दो वरदान देती थी। किंवदंती थी कि जिसने भी माँगा उसे पहला वरदान मिला, पर दूसरे में मौत माँगनी पड़ी। बस यही वजह थी कि कोई नहीं जाता था दोवरी माता के द्वार। इस डर से कि कहीं भूल से मन ही मन पहला वरदान माँग लिया, तो फिर क्या होगा। उच्चत वालों ने लगता है इस ऊहापोह से बचने के लिए, एक आँटड़ा लगा दिया था कि माता उच्चत वालों को वरदान नहीं देती है। सुनी हुई बात पर भी उन दिनों लोग पूरा विश्वास करते थे। सच और झूठ खूब बिकते थे, यूँ तो तब भी, पर कोई मोल नहीं था।
दोवरी माता कोई करिश्मा नहीं करती थी, बस ज़िन्दगी में ऐसा कुछ घट जाता था कि वरदान पूरा हो जाता था। कहने वाले कहते थे कि आखिरी बार कोई 70 साल पहले किसी ने पुत्रप्राप्ति का वरदान माँगा था। पुत्र मिला भी, सुन्दर और स्वस्थ, पर याचक जो कि सीहोर का ही ब्राह्मण था, पुत्र के पग चलने से पहले ही, माता के यहाँ गया और माता के ऊपर से गयी पीपल की बड़ी सी शाखा पर रस्सी बांध कर लटक गया। दूसरा वरदान पूरा हुआ। ब्राह्मण परलोक चला गया पर रस्सी आज भी लटकती है। याद दिलाने के लिए कि दुबारा कोई वरदान मांगने की गलती नहीं करे। अब पुत्र पैदा होने के बाद ब्राह्मण ने दोवरी माता जाकर फाँसी क्यों लगाई, इसको लेकर एक ही अंदाजा है सबका। जिसका मोटा मोटा मतलब यह है कि पुत्र में पुरुष स्वयं को जीवित रखने की दम्भपूर्ण लालसा रखता है, और स्त्री पर इसका असह्य नैतिक दबाव पड़ता है।
मालिहा की स्त्री नहीं थी। सही पूछो तो आसपास ही स्त्री नहीं थी, ना माँ, ना बहन। ऐसे लोगों की ज़ुबान से माँ बहन की गालियाँ बरसती रहती हैं। मालिहा तो लोगों की ही क्या, पशुओं की, दरख्तों की, दीवारों की, खंभों की, सब की माँ बहन करता रहता था। बताते हुए भी कान पकड़ना चाहिए, अगर ज़्यादा बिखर गया हरामी तो, भगवान की ही माँ बहन पर उतर आता था। अब आप ही बताओ जिस आदमी की ज़िन्दगी में कुछ भी घटने बढ़ने की गुंजाईश नहीं हो वह करे भी क्या। और ऊपर वाला जब ऐसे लोग बनायेगा तो अपनी माँ बहन करवाने का रिस्क तो उसने खुद ही लिया ना।
चेज़े का काम करता था मालिहा। वह भी ऐसे कि तीन दिन के खाने का जुगाड़ हो गया तो तीन दिन काम से छुट्टी। चौथे दिन वापस गया, और किसी ने निकर चिकर की तो, सीधा माँ बहन पर। सामने वाला मालिक हो या ठेकेदार। काम वैसे दबा कर करता था। तो समझदार लोग चौथे दिन लौट कर आये मालिहा की तीन दिन की गैरहाज़िरी को बिना वेतन की छुट्टी मान लेते थे।
आखिर एक दिन मालिहा ने सोच ही लिया कि इस ज़िन्दगी की मां बहन करनी ही पड़ेगी, चाहे मौत ही क्यों ना आ जाये। इस दुनिया की तो ऐसी तैसी करके ही रहूँगा।
एक लाख रुपये!
अचम्भे की बात है कि जब रुपये की कोई सोचता है तो अपने हिसाब से ही सोचता है। हज़ार, लाख, करोड़। है तो एक अंक ही ना, पर कोई भी एक लाख करोड़ नहीं मांगेगा। खुद को ही विश्वास नहीं आएगा। कहाँ से लायेगी माता, और कहाँ से देगा भगवान एक लाख करोड़। पैसे के मामले में आदमी भगवान को भी अपनी औकात के हिसाब से आंकता है। मालिहा की आखिरी आखिरी औकात थी एक लाख रूपये। ऐलान कर दिया- " कल सुबह जाऊंगा उच्चत, सीधा दोवरी माता के यहाँ। और एक लाख रुपये पक्के!"
अब ऐसा बोल कर, भीखू सेठ को कोई कहे कि "लाला, आधा सेर गुड़ तोल दे बढ़िया वाला, और एक धड़ी गेंहूँ" तो मना कर सकता है क्या!
लोगों को अचम्भा तो हुआ मालिहा की हिम्मत पर। पर ध्यान था सबका दूसरे वरदान पर। देखो, कितना जल्दी पूरा होता है।
कइयों ने तो तसल्ली के लिए, आधे रास्ते तक नज़र रखी। क्या पता ऐसे हरामी का। बाद में भी पता लगवाया। उच्चत वालों ने ही बताया- "आया था, और डंके की चोट के साथ, दोवरी माता की तरफ गया भी था। बालकों ने छुपछुपा के देखा भी। बिलकुल गया था दोवरी माता के मंदिर तक।"
मालिहा को लाख रुपये तो अब मिलेंगे ही, कैसे न कैसे।और उसके बाद मरेगा भी, दूसरा वरदान माँग कर। मतलब आगे की कहानी का सारांश तो मिल गया था, अब बस उतार चढ़ाव का सिलसिला देखना था।
मालिहा सबको एक लाख का लगने लगा। उधारी मिलने लगी। मालिहा का माँ बहन करना भी ज़्यादा बुरा नहीं लगता था अब। "आदत पड़ जाये तो छूटती थोड़े ना है। वैसे मन का बुरा नहीं है।" मालिहा का वही सुर था - " इसकी माँ की, एक एक पैसा दूंगा डेढ़ टक्का ब्याज के साथ। किसी का एहसान थोड़े ही ना है, बहन...!"
अब तक मिल जाये तो पीता था, अब उधार की खरीद कर पीने लगा। दोनों वक़्त। एक लाख जो आने वाले थे। ठेके तक भी मांगी हुई साइकिल पर जाने लगा। ज़िन्दगी में कुछ तो घटा बढ़ा। बस एक लाख बाकी थे।
एक दिन नशे में दादरी गोल्डन के ट्रक के नीचे आ गया। कइयों ने तंज कसा- " कहीं सुसरे ने पहले वरदान में ही तो मौत नहीं माँग ली, जल्दी जल्दी में।"
मालिहा मरा नहीं। बस एक हाथ और एक पैर गवां कर आधा सा मालिहा बच गया। हाथ और पैर भी दोनों एक तरफ के गंवाए। लगता था आदमी नहीं, आदमी की फाँक है। भगवान और माता की तो मां बहन होनी ही थी।
पर बात जब घनश्याम वकील के पास पहुँची तो माता की करनी का प्लॉट उसे समझ में आ गया। एक लाख आएगा, पक्का। दादरी गोल्डन को मुआवजा देना पड़ेगा। दो भी मिल सकता है। पर बिना पैसे के केस लड़ना पड़ेगा।
चैम्पटी!
चैम्पटी के बारे में पढ़ा था। था तो वकालत के पेशे में अनैतिक काम, पर कर लिया चैम्पटी करार: " तीसरा हिस्सा लूंगा। एक से ज़्यादा भी मिल सकता है।"
" जो करना है कर ले!" के बाद मालिहा ने जो माँ-बहन की; वकील को समझ नहीं आया, निशाने पर वह है, भगवान है, माता है, दुनिया है या दादरी गोल्डन। झड़ी सी लगा दी।
पर कुछ नहीं हुआ। केस हार गया सेशन कोर्ट में। "तुम्हारे मुवक्किल ने शराब पी रखी थी। मुआवजा देने से गलत लत को बढ़ावा मिल सकता है।"
आप ही सोच लो मालिहा ने क्या बोला होगा।
हाँ, दादरी गोल्डन ने तरस खाकर एक डीज़ल से चलने वाली फिटफिट ज़रूर दिलवा दी मालिहा को। इस उम्मीद में कि अपील में नहीं जायेगा। पर घनश्याम वकील ने तो अपने तीसरे हिस्से का हिसाब लगा कर, प्लॉट की नींव उठा रखी थी। दो कमरे का प्लान तैयार था। हाई कोर्ट में अपील डाल दी।
ईधर मालिहा की गालियां सुनने में कइयों को तो मज़ा सा आने लगा।' चलो एक लाख नहीं पर फिटफिट तो मिली। यह भी लाख की ही है मालिहा के लिए। माता ने गिफ्ट में दी है।'
फिटफिट हफ्ते में दो लीटर डीज़ल माँगती थी।
रोज़ रोज़ हाथ फैलाने से मिली ज़लालत तले दबकर मालिहा की गालियाँ ढीली पड़ गई।
भीखू सेठ का तो पता ही है, कैसा भिगो कर मारता है। "मालिहा तेरा यह वरदान तो तेरे को ही नहीं गाँव को भी भारी पड़ रहा है।"
" बस आखिरी बार भीखू सेठ।"
" हाँ, पहला तो मिला नहीं है, अब दूसरा माँग ले। ठीक रहेगा।"
मालिहा चुप रहा।
दूसरे दिन पंजाब केसरी के एक कोने में छोटी सी खबर थी। ' हाई कोर्ट ने दादरी गोल्डन को एक लाख तीस हज़ार रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया। सड़क दुर्घटना में सीहोर गॉंव के मल्हाराम ने अपना एक हाथ और एक पैर गंवाया था।"
मिनटों में छोटी सी खबर बड़ी बन गई। मालिहा के लिए ढूंढ़ेरा पिट गया। एक लड़के ने बताया- ' दो घंटे पहले अपनी फिटफिट पर उच्चत की राह जाता देखा था।
देर हो चुकी थी। मल्हाराम ने अपना दूसरा वरदान भी प्राप्त कर लिया था।

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गदूद

गदूद
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शिब्बू चाचा रोज़ एक घंटा नीम की दातुन से दाँत घिसते थे। हम समझते दाँत चमकाने का बहुत ही शौक है। काहे का शौक! रमती चाची रोज़ नाक सिकोड़ती थी, " इस मुँह को तो पन दूर ही रखो। बास मारे है।" उस आनंद क्षण में पिन सी लगती थी, पर झेल जाते। शिब्बू चाचा का ऐसे ही ख्याल आ गया, बात भूरा काका की है। बीड़ी की बू आती थी, बहुत तेज़। जैती काकी का भी एन मौके मुँह के आगे हाथ करके वही करना - "उँ हूँ... हे भगवान, क्या बदबू है!"
भूरा काका का अपना वही, घिसा पिटा बचाव, " कुछ नहीं रे, बीड़ी की बास है!" हार कर जैती काकी ने भी बीड़ी थाम ली। फिर क्या था... कि फिर आने लगी... अजी आने लगी.. दोनों तरफ बास बराबर!
हम सब बहुत बड़े बड़े काम करने के लिए इस दुनिया में आते हैं। पर होता क्या है, उस जगह पहुँच कर ज़्यादातर लोग रुक जाते हैं।
" ओहो, यह क्या है, क्या आनंद है रेे!" खान, पान, मान, प्रतिष्ठा, सबसे ऊपर है यह आनंद। कुदरत ने बहुत ही हरामी चाल चली है, कसम से। सबको दिया है, यह आनंद। गरीब और निठ्ठले को तो खूब ही दिया है। बस औरत मिलनी चाहिए। बिरधी जोशी का कहना है - नरक का द्वार है नारी!
हाँ जी, गदूद फूलने के बाद तो नरक का द्वार ही है।
उससे पहले तो जब जैती काकी ने मांगी पाजेब, तो भूरा काका ने भर लिया बाहों में, और सीधा पलंग पर। यह नाक के बूंदों का, यह नई साड़ी का, यह खुशी का, यह मातम का,,, हर बात की एक समिधा छोड़ दी... स्वाहा ! स्वाहा ! हवन है क्या भई? हवन ही समझो जी।
अब की बार गांव गया तो जग्गन भैया ने कहा, " अरे, भूरिया काका से भी मिल कर जाना।" ऐसे कथन जैसे लगते हैं उतने सामान्य नहीं होते हैं। निहित अर्थ था- "जाने वाले से आखिरी मुलाकात कर लेनी चाहिए!"
भूरा काका पड़े थे खाट पर, स्थिर आंखें शून्य में ताक रह थी। नैहर छूटल जाय...।
हमें तो मुस्कुराकर पूछना था, हिम्मत तो देनी ही होती है। चाहे सामने वाला हाथ हिला कर मना कर दे। वही हुआ। हमने कहा, " क्या हुआ काका, क्या बोला है डाक्टर ने?"
काका ने हाथ थोड़ा ऊपर उठाकर हिलाया, जैसे कह रहे हों," देख ले, खाली हाथ जा रहा हूँ।"
यहाँ काकी का बोलना बनता था। "ना रे भाई, कितने टेस्ट कर लिए, कुछ नहीं आया रिपोर्ट में।" मानो कह रही थी, " बस हो लिया सब खत्म, अब तू अपनी अलग बघार कर, नई भागमभाग मत करवा देना। कुछ दिन तो मैं भी जीऊँ, अपने हिसाब से। क्या यह अब हमेशा ही मेरे सिर पर बैठा रहेगा।"
मैं चुप मार गया।
जग्गन भैया ने एक तरफ लेकर मेरे कान में कहा। "कुछ नहीं, गदूद फूल गई है।"
" गदूद?"
" अरे भाई, वो क्या कहते हैं... प्रोस्ट्रेट.. प्रोस्ट्रेट ट्यूमर है!"
मैंने मन ही मन कहा, " हाँ गदूद! सुना था यह लफ्ज़ कभी। और जब नारी नरक का द्वार है, मेरे पुरुष मित्रो, तो तुम उस द्वार की ओर जाओ या नहीं जाओ, गदूद को फूलना होगा तो फूल ही जाएगी!"

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माँ

ठंडी दिसंबर का कोई जमा हुआ दिन था। सामने सफेद धुंध किसी कमसिन षोडशी के समान आंचल लहरा रही थी।स्कूटर की रोशनी में नीलाभ सड़क सफेद आंचल पर स्याही के धब्बे के समान उभर मिट रही थी। अमृता के मन पर सर्द मौसम अपना असर दिखा चुका था। बहुत कोशिश करके भी वह खुद को सामान्य नहीं कर पा रही थी, पर स्कूल जाना उसकी जिंदगी का एक हिस्सा था।कक्षा में मनु आज भी सबसे आखिर में बैठा था...नितांत मौन,खोया सा। पता नहीं क्यों, उसके पास से गुजरते हुए अमृता को एक बार फिर लहराती सनसनाती ठंडी सिहरन का एहसास हुआ।

 "मैडम आपको प्रिंसिपल साहब बुला रहे हैं, दरवाजे से चपरासी का सपाट स्वर उभरा।उसने बेपरवाही से मनु को देखा,वह क्लास से बाहर देख रहा था।मॉनिटर को खड़ा कर कक्षा को चुप रहने का आदेश दे वह ऑफिस की तरफ चल पड़ी।"बात क्या है, अमृता जी?"प्रिंसिपल ने सीधा सवाल किया,आप एक छोटे से बच्चे के कारण अपनी कक्षा बदलना चाहती हैं या उसे दूसरे सेक्शन में शिफ्ट करवाना चाहती हैं, ऐसा क्या हो गया?"मैंने आपको सारे कारण अपनी रिक्वेस्ट के साथ ही भेज दिए थे,अमृता ने खीझ दबाते हुए कहा। हम्म्म.. प्रिंसिपल साहब अमृता का चेहरा पढ़ रहे थे। सर, अमृता फट पड़ी,यह बच्चा ठीक नहीं है, पत्थर पर भी असर होता है पर वह तो .... न बोलता है, न याद करता है, न सुनाता है। होमवर्क करता है तो सारा गलत। मैंने हर तरीका अपनाया प्यार से समझा कर, डांटकर,सजा देकर...। मारना मेरा स्वभाव नहीं है,पर फिर भी इसको एकाध चपत लग ही जाती है, वह कोई जवाब भी नहीं देता, बस टुकुर टुकुर ताकता रहता है। मैं तंग आ गई हूँ... अमृता ने एक ही सांस में कह डाला। और कुछ..? प्रिंसिपल साहब ने शांति से पूछा। नहीं, और कुछ नहीं, अमृता ने खीझ मिश्रित लापरवाही से कहा।
बैठो, प्रिंसिपल साहब ने ठंडी सांस भर कर कहा, बात वह नहीं होती जो नजर आती है। आपने तस्वीर का एक ही पहलू देखा है प्रिंसिपल साहब उठ कर खिड़की के पास चले गए बाहर क्यारी में कैक्टस उगे थे कँटीले, सुनसान पर हरे-भरे...वह मुस्काए।अमृता जी, चलिए आज आपको इस कैक्टस की असली जमीन दिखाता हूँ। तब शायद आपको सब कुछ इतना बुरा न लगे।
"मैं कुछ समझी नहीं सर," अमृता हैरान थी कि प्रिंसिपल साहब कहना क्या चाहते हैं ? पर उसने बात को समझने का फैसला किया। प्रिंसिपल साहब ने अपनी मेज के पास लौट कर ड्रार खोला और कुछ तस्वीरें अमृता के सामने फैला दीं। अमृता ने देखा, एक शानदार बंगला, एक बेहद सुदर्शन पुरुष, एक खूबसूरत जोड़ा,एक भोली सी मासूम औरत और उसकी गोद में नन्हा सा खिलखिलाता हुआ बच्चा और उस बच्चे की खेलते-कूदते खिलखिलाते हुए कुछ प्यारी तस्वीरें।"यह सब, किसकी तस्वीरें हैं ?अमृता को कुछ समझ नहीं आया। प्रिंसिपल साहब ने पुरुष की तस्वीर उठाकर सामने रखी यह मेरा दोस्त अभिनव है, औरत की तस्वीर को उठाया और बोले, यह उसकी पत्नी।तीसरी तस्वीर यह उसका घर और यह उसका बच्चा। "ओह, देखने में तो बहुत अमीर और खुशहाल परिवार लगता है, परंतु आप मुझे यह सब क्यों दिखा रहे हैं?अमृता ने कुछ न समझते हुए कहा। "क्योंकि यह बच्चा आप का मनु है, प्रिंसिपल साहब ने उदासी से कहा।"क्या..?"अमृता अवाक थी। "अभिनव की शादी 10 साल पहले हुई थी, प्रिंसिपल साहब जैसे कहीं दूर खो से गए थे।" बहुत खूबसूरत प्यारी सी पत्नी नीला और फिर यह नन्हा सा मनु, दोनों बहुत खुश थे।परंतु फिर एक तूफान आया।नीला को ब्लड कैंसर हो गया।इससे पहले कि इलाज अपना असर दिखाता नीला जा चुकी थी,अभिनव और मनु से बहुत दूर।अभिनव टूट गया था, उसे खुद संभालना नहीं आ रहा था,नन्हें मनु को क्या संभालता? बस नौकरों के हाथों घर और मनु को सौंप कर खुद को काम में डुबो दिया। मनु की माँ भगवान ने छीन ली थी और पिता खुद पिता ने। प्रिंसिपल साहब का स्वर भीग गया। अब तुम ही कहो अमृता,एक छोटा बच्चा आखिर कैसा हो सकता है जिसके पास न मां है, न पिता?उस घर में अब दो मशीनें रहती हैं," प्रिंसिपल साहब की आवाज सुनसान सी हो आई, "मनु को मां चाहिए अमृता जी और दूसरी शादी अभिनव किसी कीमत पर करेगा नहीं, अब ऐसे में यह नन्हा बालक करे भी तो क्या करे??? आप तो उसकी टीचर हैं, अब आप ही बताइए क्या होगा इस छोटे से बच्चे का?आप भी इससे भाग रही हैं, परंतु मैं क्या करूं? यह मेरे दोस्त का बेटा है, मेरी भी तो कुछ जिम्मेदारी है।आप कोई हल बता सकती हैं?अमृता मौन थी।वह चुपचाप अपनी कक्षा में लौट आई,मनु कॉपी पर कुछ लिख रहा था बाकी बच्चे शरारतों में मशगूल थे।अमृता ने बच्चों को डांटा और किताब खोल कर अगला पाठ पढ़ाने लगी। मैम, यह डब्बा नहीं खुल रहा,आज पहली बार आधी छुट्टी के वक्त मनु उसके पास आया था। उसका टिफिन कुछ ज्यादा ही टाइट था।अमृता ने बड़ी मेहनत से उसे खोला उसमें एक सैंडविच था,बस इतना ही खाओगे? अमृता ने प्यार से पूछा।उत्तर में मनु ने केवल सिर हिलाया और जाने लगा।अमृता ने फिर पूछा,"मेरे पास आलू का पराँठा है, तुम खाओगे ?" मनु ने आंख उठाकर उसको देखा, फिर पता नहीं क्या सोचकर उसने हां में सिर हिलाया। अमृता ने अपना टिफिन उसके आगे कर दिया।वह झिझका, "थोड़ा सा खा लो नहीं अच्छा लगा तो मत खाना,"अमृता का मीठा स्वर जाने क्यों उसको छू गया। मनु में चुपचाप धीरे से एक बाइट ली और खा ली।अच्छा लगा ?अमृता ने पूछा। मनु ने न में सिर हिलाया और वापस मुड़ गया। इससे पहले अमृता कुछ सोच पाती, वह रूका और वापस मुड़कर दौड़ता हुआ अमृता से लिपटकर ज़ोर ज़ोर से रोने लगा। अमृता को कुछ समझ नहीं आया। उसने उसका चेहरा ऊपर उठाया, इससे पहले कि वह कुछ पूछती वह चिल्ला उठा- माँ...आँ...आँ... अमृता की छाती में हूक सी उठी और उसने लपक कर मनु को सीने से लगा लिया। प्रिंसिपल साहब दरवाजे पर खड़े माँ बेटे का यह अनोखा मिलन देख रहे थे । बाहर क्यारी में लगे कैक्टस में फूल खिल आए थे, गुलाबी, चटक,खूबसूरत।
डॉ सूफ़ी

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कहानी के नज़रिये से
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जैसा कि मैं कहता रहा हूँ, कहानी लिखना कहानी पढ़ने से आता है। और अच्छी कहानी लिखना सब कुछ पढ़ने से आता है। अगर आपको मेरी कहानियाँ कथ्य और शैली दोनों में अलग लगती हैं तो मैं कहूँगा इसके पीछे और कुछ नहीं " यह सब कुछ पढ़ना" है। कहानी ज्ञान का अन्तिम मिश्रण है।
केमिस्ट्री की हॉफ रेडोक्स रिएक्शन हों, या कुआंतम फिजिक्स की सृष्टि में निहित चार आधारभूत शक्तियां, बिज़नस की डबल एंट्री, इंजीनिरिंग का डेड या डायनामिक लोड, या बायोलॉजी की एंडोक्राइन ग्लैंड्स, हर कुछ अन्तत: कहानी में जाकर मिल जाते हैं। और एक अलग नजरिया हासिल होता है। मसलन, प्रकृति ने फल मनुष्य के खाने के लिए नहीं, पेड़ों के जीवित रहने के लिए पैदा किये हैं। भीषण मौसम में पूरा द्रव उनमें बचा कर रखता है एक वृक्ष, और वर्षा आने से पहले पूरा द्रव चूस कर बीज धरती पर छोड़ देता है। मनुष्य का नजरिया कुहरे से ढका है। वह समझता है इस प्रकृति में वह विशिष्ट है, लाडला है, बहुत कुछ उसकी ज़रूरतों को ध्यान में रख कर हुआ है।
आज बात अर्थशास्त्र की, कहानी के नज़रिये।
मैं इसे 'न्याय' नहीं कहूँगा, क्योंकि राजनीतिक शब्दावली से बात अपने मतलब से इधर उधर निकल सकती है। मैं गरीबों के हाथ में ज़्यादा पैसे देने की अर्थव्यवस्था का पक्षधर रहा हूँ। मैं बीसों साल से कह रहा हूँ, एक ईंट लगाने वाले कारीगर को उतने ही पैसे मिलने चाहियें जो एक बैंक के कैशियर को मिलते हैं। सीधी ईंटों की दीवार बनाना, बैंक में नोट गिनने से कहीं ज़्यादा कठिन है। खैर, किसी ने आखिर सोचा, राजनीतिक मजबूरी में ही सही, कि बजट का दस बारह प्रतिशत सीधा गरीबों के हाथ में जाना चाहिए। काम, नौकरी बगैरा अलग मुद्दे हैं। आज भी बहुत सी जगह लोग बैठे हैं सरकारी दफ्तरों में, जो काम क्या कर रहे हैं, कुछ समझ नहीं आता। कल पासपोर्ट ऑफिस में एक ' एग्जिट' काउंटर देखा, जिस पर एक महिला बैठी फीडबैक फॉर्म भरने की हिदायत दे रही थी। जब मैंने कहा- यह तो ऑप्शनल है? तो वह चिढ कर बोली- हाँ, ऑप्शनल है, आराम से बैठ कर भरिये।
आखिर क्या होगा, इतनी सारी रकम एक गैर- उत्पादक तरीके से खर्च करने पर। पहले तो एक बात समझना जरूरी है कि मुद्रा चलन के दायरे में तरल गुण रखती है। तभी तो हम कहते रहे हैं कि ऊपर से डालो तो नीचे तक नहीं पहुंचती है बीच में ही हज़म हो जाती है। पानी नीचे से जल्द गर्म होता है क्योंकि गर्म होकर पानी के अणु ऊपर भागते हैं, और पूरा पानी जल्दी गर्म हो जाता है।
अब यह जो तीन चार लाख करोड़ रुपये हर साल गरीबों के हाथ में जायेगा (अगर ऐसा हुआ तो), यह व्यवस्था में तेज़ी से घूमेगा, क्योंकि उन गरीबों के पास इसे जोड़ने, रखने की सामर्थ्य नहीं है। जायेगा और आयेगा। अर्थव्यवस्था में तेज़ उछाल आएगा। दूसरे, इसका अधिकांश हिस्सा ग्रामीण इलाकों में जायेगा। गरीब, मज़दूर, छोटे किसान, छोटे दूकानदार जो बैठ कर एक निराशा की जकड़ में आ गए थे, उनमें एक जीवन ऊर्जा का संचार होगा। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को त्वरण मिलेगा।
और जो मौद्रिक वितरण का उल्टा पिरामिड बन गया था, उसका आकार थोड़ा बदलेगा। उसमें स्थायित्व पैदा होगा।
भारत की कहानी में एक बदलाव ज़रूर आएगा। आगे क्या होगा, नहीं कह सकते, क्योंकि यह कहानी किसी एक लेखक की कलम से नहीं लिखी जा रही है। हम सब इसके रचियता हैं। 

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