मेन्यू के लिए ऊपर मैरून स्ट्रिप को टैप करें

अपनी सभी पोस्ट्स देखने के लिए अपने नाम पर टैप करें। किसी अन्य सदस्य की पोस्ट्स देखने के लिए Members पर टैप कर के उस सदस्य के नाम पर टैप करें।

कृपया स्माइली का प्रयोग न करें

दैनिक आयोजनों की पोस्ट के लिए आपको 7 दिन मिलते हैं यानी जब तक उस दिन के लिए अगला प्रोग्राम न दे दिया तब तक। इस तरह आप प्रतिदिन हर प्रोग्राम की रचना पोस्ट कर सकते हैं



कहानी

कहानी के नज़रिये से
*****************
जैसा कि मैं कहता रहा हूँ, कहानी लिखना कहानी पढ़ने से आता है। और अच्छी कहानी लिखना सब कुछ पढ़ने से आता है। अगर आपको मेरी कहानियाँ कथ्य और शैली दोनों में अलग लगती हैं तो मैं कहूँगा इसके पीछे और कुछ नहीं " यह सब कुछ पढ़ना" है। कहानी ज्ञान का अन्तिम मिश्रण है।
केमिस्ट्री की हॉफ रेडोक्स रिएक्शन हों, या कुआंतम फिजिक्स की सृष्टि में निहित चार आधारभूत शक्तियां, बिज़नस की डबल एंट्री, इंजीनिरिंग का डेड या डायनामिक लोड, या बायोलॉजी की एंडोक्राइन ग्लैंड्स, हर कुछ अन्तत: कहानी में जाकर मिल जाते हैं। और एक अलग नजरिया हासिल होता है। मसलन, प्रकृति ने फल मनुष्य के खाने के लिए नहीं, पेड़ों के जीवित रहने के लिए पैदा किये हैं। भीषण मौसम में पूरा द्रव उनमें बचा कर रखता है एक वृक्ष, और वर्षा आने से पहले पूरा द्रव चूस कर बीज धरती पर छोड़ देता है। मनुष्य का नजरिया कुहरे से ढका है। वह समझता है इस प्रकृति में वह विशिष्ट है, लाडला है, बहुत कुछ उसकी ज़रूरतों को ध्यान में रख कर हुआ है।
आज बात अर्थशास्त्र की, कहानी के नज़रिये।
मैं इसे 'न्याय' नहीं कहूँगा, क्योंकि राजनीतिक शब्दावली से बात अपने मतलब से इधर उधर निकल सकती है। मैं गरीबों के हाथ में ज़्यादा पैसे देने की अर्थव्यवस्था का पक्षधर रहा हूँ। मैं बीसों साल से कह रहा हूँ, एक ईंट लगाने वाले कारीगर को उतने ही पैसे मिलने चाहियें जो एक बैंक के कैशियर को मिलते हैं। सीधी ईंटों की दीवार बनाना, बैंक में नोट गिनने से कहीं ज़्यादा कठिन है। खैर, किसी ने आखिर सोचा, राजनीतिक मजबूरी में ही सही, कि बजट का दस बारह प्रतिशत सीधा गरीबों के हाथ में जाना चाहिए। काम, नौकरी बगैरा अलग मुद्दे हैं। आज भी बहुत सी जगह लोग बैठे हैं सरकारी दफ्तरों में, जो काम क्या कर रहे हैं, कुछ समझ नहीं आता। कल पासपोर्ट ऑफिस में एक ' एग्जिट' काउंटर देखा, जिस पर एक महिला बैठी फीडबैक फॉर्म भरने की हिदायत दे रही थी। जब मैंने कहा- यह तो ऑप्शनल है? तो वह चिढ कर बोली- हाँ, ऑप्शनल है, आराम से बैठ कर भरिये।
आखिर क्या होगा, इतनी सारी रकम एक गैर- उत्पादक तरीके से खर्च करने पर। पहले तो एक बात समझना जरूरी है कि मुद्रा चलन के दायरे में तरल गुण रखती है। तभी तो हम कहते रहे हैं कि ऊपर से डालो तो नीचे तक नहीं पहुंचती है बीच में ही हज़म हो जाती है। पानी नीचे से जल्द गर्म होता है क्योंकि गर्म होकर पानी के अणु ऊपर भागते हैं, और पूरा पानी जल्दी गर्म हो जाता है।
अब यह जो तीन चार लाख करोड़ रुपये हर साल गरीबों के हाथ में जायेगा (अगर ऐसा हुआ तो), यह व्यवस्था में तेज़ी से घूमेगा, क्योंकि उन गरीबों के पास इसे जोड़ने, रखने की सामर्थ्य नहीं है। जायेगा और आयेगा। अर्थव्यवस्था में तेज़ उछाल आएगा। दूसरे, इसका अधिकांश हिस्सा ग्रामीण इलाकों में जायेगा। गरीब, मज़दूर, छोटे किसान, छोटे दूकानदार जो बैठ कर एक निराशा की जकड़ में आ गए थे, उनमें एक जीवन ऊर्जा का संचार होगा। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को त्वरण मिलेगा।
और जो मौद्रिक वितरण का उल्टा पिरामिड बन गया था, उसका आकार थोड़ा बदलेगा। उसमें स्थायित्व पैदा होगा।
भारत की कहानी में एक बदलाव ज़रूर आएगा। आगे क्या होगा, नहीं कह सकते, क्योंकि यह कहानी किसी एक लेखक की कलम से नहीं लिखी जा रही है। हम सब इसके रचियता हैं। 

E-mail me when people leave their comments –

You need to be a member of Sukhanvar International to add comments!

Join Sukhanvar International

प्रयागराज - लखनऊ - कानपुर - नोएडा - नई दिल्ली - चंदौसी - मेरठ - साँईखेड़ा - इंदौर - भोपाल - जयपुर - आगरा